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________________ गा० ५८] प्रदेशसंक्रमस्थान-अल्पबहुत्व-निरूपण ४६३ हाणाणि विसेसाहियाणि । ७२०. इथिवेदे पदेससंकमट्ठाणाणि संखेज्जगुणाणि । ७२१. सोगे पदेससंकमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ७२२. अरदीए पदेससंकमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ७२३. णवुसयवेदे पदेससंकमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ७२४. दुगुंछाए पदेससंकमट्टाणाणि विसेसाहियाणि । ७२५. भए पदेससंकमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ७२६. पुरिसवेदे पदेससंकमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ७२७. माणसंजलणे पदेससंकमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि | ७२८ कोहसंजलणे पदेससंकमहाणाणि विसेसाहियाणि । ७२९. मायासंजलणे पदेससंकमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ७३०. लोहसंजलणे पदेससंकमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ७३१. सम्मत्ते पदेससंकमट्ठाणाणि अणंतगुणाणि । ७३२. सम्मामिच्छत्ते पदेससंकमट्ठाणाणि असंखेज्जगुणाणि । ७३३. केण कारणेण णिस्यगईए पञ्चक्खाणकसायलोभपदेससंकमट्ठाणेहितो मिच्छत्ते पदेससंकमट्ठाणाणि असंखेज्जगुणाणि १ ७३४. मिच्छत्तस्स गुणसंकमो अत्थि, पञ्चक्खाणकसायलोहस्स गुणसंकमो णत्थि; एदेण कारणेण णिरयगईए पचक्खाणकसायलोहपदेससंकमट्ठाणेहितो मिच्छत्तस्स पदेससंकमाणाणि असंखेज्जगुणाणि । ___ ७३५. जस्स कम्मस्स सव्वसंकमो णस्थि तस्स कम्मस्स असंखेज्जाणि हास्यसे रतिमे प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। रतिसे स्त्रीवेदमे प्रदेशसंक्रमस्थान संख्यातगुणित हैं। स्त्रीवेदसे शोकमे प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक है। शोकसे अरतिमें प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। अरतिसे नपुंसकवेदमे प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। नपुंसकवेदसे जुगुप्सामें प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। जुगुप्सासे भयमें प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। भयसे पुरुषवेदमें प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। पुरुषपेपत्ते संज्वलनानमा प्रदेशसभामस्थान विशेप अधिक हैं। संज्वलनमानसे संज्वलनकोधमे प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं । संज्वलनकोनऐ ज्वलनमायाम प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक है। संज्वलनमायासे संज्वलनलोभम प्रदेशसंक्रमस्थान विशप पिक है। संज्वलन लोभसे सम्यक्त्वप्रकृतिमे प्रदेशसंक्रमस्थान अनन्तगुणित है। सम्यक्त्वप्रकृतिसे सम्यग्मिथ्यात्वमे प्रदेशसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित हैं ॥७१८-७३२॥ का-नरकगतिमें प्रत्याख्यानलोभकपायके प्रदेशसंक्रमस्थानोंसे मिथ्यात्वमे प्रदेशसंक्रमस्थान किस कारणसे असंख्यातगुणित होते हैं ? ॥७३३॥ समाधान-मिथ्यात्वका गुणसंक्रमण होता है, किन्तु प्रत्यारानलोभकषायका गुणसंक्रमण नही होता , इस कारणसे नरकगतिमें प्रत्याख्यानलोभकपायके प्रदेसंक्रमस्थानोसे मिथ्यात्वके प्रदेशसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित होते हैं ॥७३४॥ । चूर्णिसू०-जिस कर्मका सर्वसंक्रमण नहीं होता है, उस कर्मके प्रदेशसंक्रमस्थान
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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