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________________ ४६२ फसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार ___७०६.एईदिएसु मव्वत्थोवाणि अपश्चक्खाणमाणे पदेससंकमट्ठाणाणि । ७०७. कोहे पदेससंकमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ७०८. मायाए पदेससंक्रमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ७०९. लोहे पदेससं कमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ७१०. पञ्चक्खाणमाणे पदेससंकयवाणाणि विसेसाहियाणि । ७११. कोहे पदेससंकमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ७१२. मायाए पदेससंकमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ७१३. लोहे पदेससंकमट्ठाणाणि । विसेसाहियाणि । ७१४. अणंताणुवंधिमाणे पदेससंकमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ७१५. कोहे पदेससंकमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ७१६. मायाए पदेससंकमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि | ७१७. लोहे पदेससंकमट्ठाणाणि विसेसाहियाणि । ७१८. हस्से पदेससंकमट्ठाणाणि असंखेजगुणाणि । ७१९. रदोए पदेससंकमहोते हैं । पुरुषवेदसे संज्वलनमानमे प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक होते है। संज्वलनमानसे संज्वलनक्रोधमे प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक होते हैं। संज्वलनक्रोधसे संज्वलनमायामें प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक होते हैं। संज्वलनमायासे संज्वलनलोभमें प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक होते हैं । संज्वलनलोभसे अनन्तानुबन्धी मानमें प्रदेशसंक्रमस्थान अनन्तगुणित होते हैं। अनन्तानुबन्धी मानसे अनन्तानुबन्धी क्रोधमे प्रदेश संक्रमस्थान विशेष अधिक होते हैं अनन्तानुबन्धी क्रोधसे अनन्तानुबन्धी मायामें संक्रमस्थान विशेष अधिक होते हैं । अनन्तानुबन्धी मायासे अनन्तानुबन्धी लोभमें प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक होते हैं । तिर्यंचगतिमे भी पंचेन्द्रियतिथंच अपर्याप्तकोके प्रदेशसंक्रमस्थानोका अल्पवहुत्व आगे कहे जानेवाले एकेन्द्रिय जीवोके अल्पबहुत्वके समान जानना चाहिए । मनुष्य-अपर्याप्तक जीवोके प्रदेशसंक्रमस्थानोंका अल्पवहुत्व पंचेन्द्रिय-अपर्याप्तकोके समान जानना चाहिए। चूर्णिसू०-(इन्द्रियमार्गणाकी अपेक्षा) एकेन्द्रियोमे अप्रत्याख्यानमानके प्रदेशसंक्रमस्थान सबसे कम हैं। अप्रत्याख्यानमानसे अप्रत्याख्यान धिमे प्रदेशसक्रमस्थान विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यान क्रोधसे.. अप्रत्याख्यानमायामे प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यानमायासे अप्रत्याख्यानलोभमे प्रदेशसंक्रमस्थान विशेप अधिक हैं। अप्रत्याख्यानलोभसे प्रत्याख्यानमानमे प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। प्रत्याख्यानमानसे प्रत्याख्यानक्रोधमे प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। प्रत्याख्यानक्रोधसे प्रत्याख्यानमायामें प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं। प्रत्याख्यानमायासे प्रत्याख्यान लोभमें प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक हैं । प्रत्याख्यानलोभसे अनन्तानुवन्धी मानमे प्रदेशसंक्रमस्थान विशेप अधिक हैं । अनन्तानुबन्धी मानसे अनन्तानुबन्धी क्रोधमे प्रदेशसंक्रमस्थान विशेप अधिक हैं । अनन्तानुबन्धी क्रोधसे अनन्तानुवन्धी मायामें प्रदेशसंक्रमस्थान विशेष अधिक है। अनन्तानुवन्धी मायासे अनन्तानुबन्धी लोभमे प्रदेशसंक्रमस्थान अधिक है ।।७०६-७१७।। चूर्णिसू०-अनन्तानुवन्धी लोभसे हास्यमें प्रदेशसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित है।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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