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________________ गा० ५८] प्रदेशसंक्रम-पदनिक्षेप-स्वामित्व-निरूपण ४५३ ५९३. हस्स-रदीणं जहणिया वड्डी कस्स १ ५९४. एइदियकम्मेण जहण्णएण संजमासंजमं संजमं च बहुसो लद्धण चत्तारि वारे कसाए उवसामेऊण एइदिए गदो । तदो पलिदोवमस्सासंखेज्जदिभागं कालमच्छिऊण सण्णी जादो। सव्यमहतिमरदि-सोगबंधगद्ध कादूण हस्स-रदीओ पबद्धाओ । पहमसमयहस्स-रइबंधगस्स तप्पाओग्गजहण्णओ बंधो च आगमो च तस्स आवलिय-हस्स-रदिवंधमाणस्स जहणिया हाणी । ५९५. तस्सेव से काले जहणिया वड्डी । ५९६. अरदिसोगाणमेवं चेव । णवरि पुच्वं हस्स-रदीओबंधावेयव्याओ । तदो आवलिय-अरदि-सोगवंधगस्स जहणिया हाणी। से काले जहणिया वड्डी । ५९७. एवमित्थिवेद-णबुंसयवेदाणं । ५९८. णवरि जइ इथिवेदस्स इच्छसि, पुवं णqसयवेद-पुरिसवेदे बंधावेदूण पच्छा इत्थिवेदो बंधावेयव्यो । तदो आवलियइत्थिवेदबंधमाणयस्स इत्थिवेदस्स जहणिया हाणी । से काले जहणिया वड्डी । ५९९. जदि णबुंसयवेदस्स इच्छसि, पुव्वमित्थि-पुरिसवेदे बंधावेदूण पच्छा णबुंसयवेदो शंका-हास्य और रतिकी जघन्य वृद्धि और हानि किसके होती है ? ॥५९३।। ___ समाधान-जो जीव जघन्य एकेन्द्रिय-सत्कर्मके साथ संयमासंयम और संयमको बहुत वार प्राप्त करके और चार वार कषायोका उपशमन करके एकेन्द्रियोमे गया। वहॉ पल्योपमके असंख्यातवे भागप्रमित कालतक रहकर संज्ञी जीवोमें उत्पन्न हुआ। वहॉपर सर्वमहान् अरति-शोकके बंध-कालको करके हास्य और रतिको बाँधा । प्रथमसमयवर्ती हास्यरतिके बन्धकके तत्प्रायोग्य जघन्य बन्ध है और जघन्य निर्जरा है। इसप्रकार एक आवली तक हास्य और रतिके बन्ध करनेवाले जीवके हास्य और रतिकी जघन्य हानि होती है। उसके ही तदनन्तर समयमे हास्य और रतिकी जघन्य वृद्धि होती है ॥५९४-५९५॥ चूर्णिसू०-अरति और शोककी जघन्य वृद्धि और हानि भी इसी प्रकार जानना चाहिए। विशेषता केवल यह है कि उसके पहले हास्य और रतिका वन्ध कराना चाहिए । तदनन्तर एक आवलीतक अरति-शोकके बन्ध करनेवाले जीवके अरति-शोककी जघन्य हानि होती है और तदनन्तर कालमें उसके अरति-शोककी जघन्य वृद्धि होती है ॥५९६॥ चूर्णिसू-इसीप्रकार स्त्रीवेद और नपुंसकवेदकी जघन्य वृद्धि और हानिका स्वामित्व जानना चाहिए। विशेपता केवल यह है कि यदि स्त्रीवेदकी जघन्य वृद्धि और हानि जानना चाहते हो, तो पहले नपुंसकवेद और पुरुषवेदका बंध कराके पीछे स्त्रीवेदका बन्ध कराना चाहिए । तदनन्तर एक आवलीतक स्त्रीवेदका बन्ध करनेवाले जीवके स्त्रीवेदकी जघन्य हानि होती है और तदनन्तरकालमे उसके स्त्रीवेदकी जघन्य वृद्धि होती है । यदि नपुंसकवेदकी जघन्य वृद्धि और हानि जानना चाहते हो तो पहले स्त्रीवेद और पुरुषवेदका बन्ध कराके पीछे नपुंसकवेदका बन्ध कराना चाहिए। तदनन्तर एक आवली तक
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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