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________________ ४५२ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार जहण्णजोगी जादो। तस्स समयाहियावलियउपवण्णस्स अणंताणुबंधीणं जहणिया वड्डी वा हाणी चा अवट्ठाणं वा । ५८७. अट्टण्हं कसायाणं भय-दुगुंछाणं च जहणिया वड्डी हाणी अवट्ठाणं च कस्स ? ५८८. एई दियकम्मेण जहण्णेण संजमासंजमं संजमं च बहुसो गदो। तेणेव चत्तारि वारे कसायमुवसामिदा । तदो एइदिए गदो पलिदोवमस्स असंखेजदिभार्ग कालमच्छिऊण उवसामयसमयपबद्धे सु गलिदेसु जाधे बंधेण णिज्जरा सरिसी भवदि ताधे एदेसि कम्माणं जहणिया बड्डी च हाणी च अवठ्ठाणं च ।। ५८९. चदुसंजलणाणं जहणिया वड्डी हाणी अवट्ठाणं च कस्स ? ५९०. कसाए अणुवसामेऊण संजमासंजमं संजमं च बहुसो लद्धण एइंदिए गदो । जाधे बंधेण णिज्जरा तुल्ला ताधे चदुसंजलणस्स जहणिया वड्डी हाणी अवट्ठाणं च । ५९१. पुरिसवेदस्स जहणिया चड्डी हाणी अवठ्ठाणं च कस्स ? ५९२. जम्हि अवट्ठाणं तम्हि तप्पाओग्गजहण्णएण कम्मेण जहणिया वड्डी वा हाणी वा अवट्ठाणं वा । न्द्रिय हुआ । उस एक समय-अधिक आवली कालसे उत्पन्न होनेवाले जघन्ययोगी एकेन्द्रिय जीवके अनन्तानुवन्धी कपायोकी जघन्य वृद्धि, जघन्य हानि, अथवा जघन्य अवस्थान होता है ।।५८६॥ शंका-आठो मध्यम कपायोकी और भय-जुगुप्साकी जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थान किसके होता है ? ॥५८७।। समाधान-जो जघन्य एकेन्द्रियसत्कर्मके साथ संयमासंयम और संयमको बहुत चार प्राप्त हुआ और उसने चार वार कपायोका उपशमन किया । पुनः वह एकेन्द्रियोमे चला गया। वहाँ पल्योपमके असंख्यातवे भागप्रमित कालतक रहकर उपशामककालमे बाँधेहुए समयप्रबद्धोके गल जानेपर जिस समय उसके वन्धके सदृश निर्जरा होती है, उस समय उसके इन उपर्युक्त कर्मोंकी जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थान होता है ।।५८८॥ शंका-चारो संज्वलनकपायोकी जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थान किसके होता है ? ॥५८९॥ समाधान-जो जीव कपायोंका उपशमन करके और संयमासंयम तथा संयमको वहुत वार प्राप्त करके एकेन्द्रियोमे उत्पन्न हुआ। उसके जिस समय वन्धके तुल्य निर्जरा होती है, उस समय उसके चारो संज्वलनकपायोकी जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थान होता है ।।५९०॥ शंका-पुरुपवेदकी जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थान किसके होता है ? ॥५९१॥ समाधान-जहॉपर पुरुषवेदके प्रदेशसंक्रमणका अवस्थान संभव है, वहॉपर तत्प्रायोग्य जघन्य कर्मके साथ वर्तमान जीवके पुरुपवेदकी जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थान होता है ॥५९२॥
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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