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________________ गा० ५८] प्रदेशसंक्रम-पदनिक्षेप-स्वामित्व-निरूपण ४५१ ५८१. सम्मत्तस्स जहणिया हाणी कस्स ? ५८२. जो सम्माइट्ठी* तप्पाओग्गजहण्णएण कम्मेण सागरोवमवेछावट्ठी ओगालिदूण मिच्छत्तं गदो। सव्य-महंतउव्वेल्लणकालेण उबेल्लेमाणगस्स तस्स दुचरिमद्विदिखंडयस्स चरिमसमए जहणिया हाणी। ५८३. तस्सेव से काले जहणिया वड्डी । ५८४. एवं सम्मामिच्छत्तस्स वि | ५८५. अणंताणुबंधीणं जहणिया वड्डी [ हाणी अवठ्ठाणं च ] कस्स ? ५८६. जहण्णगेण एई दियकम्मेण विसंजोएदूण संजोइदो । तदो ताव गालिदा जाव तेसिं गलिदसेसाणमधापवत्तणिज्जरा जहण्णेण एइंदियसमयपबद्धेण सरिसी जादा त्ति । केवचिरं पुण कालं गालिदस्स अणंताणुबंधीणमधापवत्तणिज्जरा जहण्णएण एइंदियसमयपबद्धेण सरिसी भवदि ? तदो पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागकालं गालिदस्स जहण्णेण एइंदियसमयपवद्धेण सरिसी णिज्जरा भवदि । जहणेण एइदियसमयवद्धेण सरिसी णिज्जरा आवलियाए समयुत्तराए एत्तिएण कालेण होहिदि ति तदो मदो एइंदिओ शंका-सम्यक्त्वप्रकृतिकी जघन्य हानि किसके होती है ? ॥५८१।। समाधान-जो सम्यग्दृष्टि जीव तत्प्रायोग्य जघन्य कर्मके साथ दो वार छयासठ सागरोपमकाल बिताकर मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ। वह जब सर्व दीर्घ उद्वेलनकालके द्वारा सम्यक्त्वप्रकृतिकी उद्वेलना करता हुआ द्विचरम स्थितिखंडके चरम समयमे वर्तमान होता है, तव उसके सम्यक्त्वप्रकृतिकी जघन्य हानि होती है ॥५८२॥ चूर्णिसू०-उसी जीवके तदनन्तर समयमे सम्यक्त्वप्रकृतिकी जघन्य वृद्धि होती है । इसी प्रकार सम्यग्मिथ्यात्वकी जघन्य वृद्धि हानिका स्वामित्व जानना चाहिए ॥५८३-५८४॥ न शंकाअनन्तानुबन्धी कपायोकी जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थान किसके होता है ? ॥५८५॥ समाधान-जो जघन्य एकेन्द्रिय-सत्कर्मके साथ पंचेन्द्रियोमे आकर और वहाँ अनन्तानुबन्धी कषायोका विसंयोजन करके अन्तर्मुहूर्त के पश्चात् ही अनन्तानुवन्धी कषायसे संयुक्त हुआ । तदनन्तर एकेन्द्रियोमे उत्पन्न होकर उसने अनन्तानुवन्धीको तब तक गलाया, जव तक कि अनन्तानुवन्धीके गलित-शेष समयप्रवद्धोकी अधःप्रवृत्तनिर्जरा जघन्य एफेन्द्रिय-समयप्रवद्धके सदृश नहीं हो जाती है। शंका-कितने कालतक गलानेपर अनन्तानुवन्धी कषायोकी अधःप्रवृत्तनिर्जरा जघन्य एकेन्द्रिय-समयप्रबद्धके सदृश होती है । समाधान-एकेन्द्रियोमे तत्प्रायोग्य पल्योपमके असंख्यातवें भाग-प्रमित काल तक गलानेवाले जीवके जघन्य एकेन्द्रिय-समयप्रबद्धके सदृश निर्जरा होती है । चूर्णिसू०-जब जघन्य एकेन्द्रिय-समयप्रवद्धके सदृश निर्जरा एक समय-अधिक आवली-प्रमित कालसे होगी अर्थात् होनेवाली थी कि तब वह मरा और जघन्ययोगी एके ताम्रपत्रवाली प्रतिमे 'सम्माइट्ठी के स्थानपर 'सम्मा [ मिच्छा ] हट्ठी' ऐसा पाठ मुद्रित है। (देखो पृ० १२९७ ) पता नहीं कोष्ठकके भीतर 'मिच्छा' पदके देनेसे सम्पादकका क्या अभिप्राय है ?
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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