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________________ ४५० कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार संकामयस्स । ५७०. उक्कस्सिया हाणी कस्स ? ५७१. गुणिदकम्मंसिओ पडमदाए कसाए उवसामेमाणो भय-दुगुंछासु चरिमसमयअणुवसंतासु से काले मदो देवो जादो । तस्स पडमसमयदेवस्स उक्कस्सिया हाणी । ५७२.उकस्सयमवट्ठाणमपञ्चक्खाणावरणभंगो। ५७३. एवमित्थि-णबुंसयवेद-हस्स-रह-अरइ-सोगाणं । ५७४. णवरि अवट्ठाणं णत्थि । ५७५. मिच्छत्तस्स जहणिया वड्डी कस्स १ ५७६. जस्स कम्मस्स अवद्विदसंकमो अत्थि, तस्स असंखेजलोगपडिभागो वड्डी वा हाणी वा अवट्ठाणं वा होई। ५७७. जस्स कम्मरस अवहिदसंकमो णत्थि तस्स वड्डी वा हाणी वा असंखेजा लोग भागो ण लभई । ५७८. एसा परूवणा अट्ठपदभूदा जहणियाए वड्डीए वा हाणीए वा अवट्ठाणस्स वा । ५७९. एदाए परूवणाए मिच्छत्तस्स जहणिया वड्डी हाणी अवहाणं वा कस्स ? ५८०. जम्हि तप्पाओग्गजहण्णगेण संकमेण से काले अवट्ठिदसंकमो संभवदि तम्हि जहणिया बड्डी वा हाणी वा । से काले जहण्णयमवट्ठाणं । शंका-भय और जुगुप्साकी उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? ॥५७०॥ समाधान-जो गुणितकांशिक जीव प्रथम वार कषायोका उपशमन करता हुआ भय और जुगुप्साको चरम समयमे उपशान्त न करके तदनन्तर कालमें मरा और देव हुआ । उस प्रथमसमयवर्ती देवके भय और जुगुप्साकी उत्कृष्ट हानि होती है ।।५७१॥ चूर्णिसू०-भय और जुगुप्साके उत्कृष्ट अवस्थानका स्वामित्व अप्रत्याख्यानावरणके उत्कृष्ट अवस्थान-स्वामित्वके समान जानना चाहिए । इसी प्रकार स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, हास्य, रति, अरति और शोककी उत्कृष्ट वृद्धि और हानिका स्वामित्व जानना चाहिए । केवल इन कर्मोंका अवस्थान नहीं होता है ।।५७२-५७४॥ शंका-मिथ्यात्वकी जघन्य वृद्धि किसके होती है ? जिस कर्मका अवस्थित संक्रमण होता है, उस कर्मकी असंख्यात लोककी प्रतिभागी वृद्धि, अथवा हानि, अथवा अवस्थान होता है । जिस कर्मका अवस्थित संक्रमण नहीं होता है, उस कर्मकी वृद्धि अथवा हानि असंख्यात लोककी प्रतिभागी नहीं प्राप्त होती है । यह प्ररूपणा.जघन्य वृद्धि, हानि अथवा अवस्थानकी अर्थपदभूत है। इस प्ररूपणासे मिथ्यात्वकी जघन्य वृद्धि, हानि अथवा अवस्थान किसके होता है ? ॥५७५-५७९॥ समाधान-जहॉपर तत्प्रायोग्य जघन्य संक्रमणसे तदनन्तर समयमे अवस्थित संक्रमण संभव है, वहॉपर जघन्य वृद्धि, अथवा हानि होती है और तदनन्तर कालमे जघन्य अवस्थान होता है ।।५८०॥ १ गुणिदकम्मसियलक्खणेणागतूण खवगसेढिमारुहिय सम्बसकमेण परिणदम्मि सव्वुक्कस्सवढिसभव पडि विरोहाभावादो। जयघ० २ किं कारणं; अवट्ठाणसकमपाओग्गपयडीसु एगेगसतकम्मपक्खेवुत्तरकमेण संतकम्मवियप्पाण पयदजहण्णवढि हाणि अवठ्ठाणणिबंधणाणमुप्यत्तीए विरोहाभावादो । जयघ० ३ कि कारण; तत्थ तदुवलभकारणसतकम्मवियप्पाणमणुप्पत्तीदो । तदो तत्थागमणिज्जरावत, पलिदोवमस्स असखेजदिभाग-पडिभागेण सतकम्मत्स वड्ढी वा हाणी वा होइ त्ति तदणुसारेणेव सकपड" ब्बा । जयघ०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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