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________________ ४५४ कसाय पाहुड सुत्त [ ५ संक्रम-अर्थाधिकार वंधाdroit | तदो आवलियणवुंसयवेदं बंधमाणयस्स जहणिया हाणी । से काले जहणिया बड्डी | ६००, अप्पाबहुअं । ६०९. उक्कस्सयं ताव । ६०२. मिच्छत्तस्स सन्वत्थोवमुक्कस्यमाणं । ६०३. हाणी असंखेज्जगुणा' । ६०४. बड्डी असंखेज्जगुणा' । ६०५. एवं वारस कसाय-भय- दुगुंछाणं । + ६०६. सम्मत्तस्स सव्वत्थोवा उकस्सिया वड्डी । ६०७ हाणी असंखेज्ज - गुणा । ६०८. सम्मामिच्छत्तस्स सव्वत्थोवा उक्कस्सिया हाणीं । ६०९. उकस्सिया बड्डी असंखेज्जगुण । ६१० एवमित्थिवेद - णवुंसयवेदस्स, हस्स-रह- अरइ- सोगाणं । ६११. कोहसंजलणस्स सव्वत्थोवा उक्कस्सिया बड्डी । ६१२. हाणी अवाणं च विसेसाहियं । ६१३. एवं माण-माया संजलण- पुरिसवेदाणं । ६१४. लोहसंजनपुंसकवेदका वध करनेवाले जीवके नपुंसकवेदकी जघन्य हानि होती है और तदनन्तर कालमे उसके नपुंसकवेदकी जघन्य वृद्धि होती है ॥५९७-५९९॥ चूर्णि सू० [0 - अव पदनिक्षेपसम्बन्धी अल्पबहुत्वको कहते हैं । उसमें पहले उत्कृष्ट अल्पबहुत्व कहते है । मिथ्यात्वका उत्कृष्ट अवस्थान सबसे कम होता है । मिथ्यात्व के उत्कृष्ट अवस्थानसे उसकी उत्कृष्ट हानि असंख्यातगुणित होती है । मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट हानिसे उसकी उत्कृष्ट वृद्धि असंख्यातगुणित होती है । इसीप्रकार अनन्तानुबन्धी आदि वाह कषाय, भय और जुगुप्साका अल्पवहुत्व जानना चाहिए || ६०० ६०५॥ चूर्णिसू० – सम्यक्त्वप्रकृतिको उत्कृष्ट वृद्धि सबसे कम होती है । इसकी उत्कृष्ट वृद्धिसे इसीकी उत्कृष्ट हानि असंख्यातगुणित होती है । सम्यग्मिथ्यात्व की उत्कृष्ट हानि सबसे कम होती है । इससे इसकी उत्कृष्ट वृद्धि असंख्यातगुणित होती है । इसी प्रकार स्त्रीवेद, नपुंसकघेद, हास्य, रति, अरति और शोकके अल्पबहुत्वको जानना चाहिए ॥ ६०६-६१०॥ चूर्णिसू० – संज्वलनक्रोधकी उत्कृष्ट वृद्धि सबसे कम होती है । इससे संज्वलन - क्रोधकी उत्कृष्ट हानि और अवस्थान विशेष अधिक होते हैं । इसीप्रकार संज्वलनमान, संज्वलनमाया और पुरुषवेदका अल्पबहुत्व जानना चाहिए । संज्वलन लोभका उत्कृष्ट अब १ कुदो; एयसमयपबद्धा संखेज दिभागपमाणत्तादो । जयध० २ कि कारण, चरिमगुणसकमादो विज्झादसकमम्मि पदिदस्स पढमसमयअसखेज समयपवद्धे हाइदूण हाणी जादा, तेणेद पदेसग्गमसखेजगुण भणिद । जयध० ३ कुदो, सव्वकमम्मि उक्करसवड्ढिसामित्तावलवणादो | जयघ० ४ किं कारणं; उव्वेल्लणकालभतरे गलिद से सदव्वस्स चरिमुव्वेल्लणक डयचरिमफालीए लदुक्कस्सभावन्तादो | जयघ ५ कुदो; मिच्छत्त गयस्स विदियसमयम्मि अधापवत्तसकमेण पडिल दुक्कस्वभावत्तादो | जयध० ६ कुदो; अथापवत्तसकमादो विज्झादसकमे पदिदपदमसमयसम्माट्ठिम्मि किंचूण अधापवत्तसकमदव्वमेत्तुक्क स्सहाणिभावेण परिग्गहादो | जयध० ७ कुदो दंसणमोहक्खवणाए सव्वसंकमेण तदुक्कस्ससा मित्तपडिलभादो । जयध
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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