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________________ ४४८ कसाय पाहुड जुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार दाए कसायउवसामणद्धाए जाधे दुविहस्स कोहस्स चरिमसमयसंकामगो जादो। तदो से काले मदो देवो जादो। तस्स पडम समयदेवस्स उक्कस्सिया हाणी । ५५१. एवं दुविहमाण-दुविहमाया दुविहलोहाणं । ५५२. णवरि अप्पप्पणो चरिमसमयसंकामगो होदूण से काले मदो देवो जादो । तस्स पडमसमयदेवस्स उक्कस्सिया हाणी । ५५३. अट्टण्हं कसायाणमुक्कस्सयमवट्ठाणं कस्स ? ५५४. अधापवत्तसंकमेण तप्पाओग्गउक्कस्सएण वड्डिपूण से काले अवहिदसंकामगो जादो । तस्स उकस्सयमवट्ठाणं । ५५५. कोहसंजलणस्स उक्कस्सिया वड्डी कस्स १५५६. जस्स उक्कस्सओ सबसंकमो तस्स उक्कस्सिया वड्ढी । ५५७. तस्सेव से काले उक्कस्सिया हाणी । ५५८. णवरि से काले संकमपाओग्गा समयपबद्धा जहण्णा कायया । ५५९. तं जहा । जेसि से काले आवलियमेत्ताणं समयपबद्धाणं पदेसग्गं संकामिज्जहिदि ते समयपबद्धा तप्पाओग्गजहण्णा । ५६०. एदीए परूवणाए सव्यसंकम संकुहिदूण जस्स से काले पुव्यपरूविदो समाधान-गुणितकर्माशिक जीव प्रथम वार कपाय-उपशमनकालमे जिस समय दोनो मध्यम क्रोधोके द्रव्यका चरमसमयवर्ती संक्रामक हुआ और तदनन्तर समयमे मर करके देव हुआ । उस प्रथमसमयवर्ती देवके दोनों क्रोधकषायोंकी उत्कृष्ट हानि होती है ।।५५०॥ चूर्णिसू०-इसीप्रकार दोनो मध्यम मान, दोनो माया और दोनों लोभकषायोकी उत्कृष्ट हानि जानना चाहिए । विशेषता केवल यह है कि मान, माया और लोभमेंसे अपनेअपने द्रव्यका चरमसमयवर्ती संक्रामक होकर तदनन्तर समयमे मरा और देव हुआ। उस प्रथमसमयवर्ती देवके विवक्षित द्विविध मध्यम मान, माया और लोभकषायकी उत्कृष्ट हानि होती है ॥५५१-५५२॥ शंका-आठो मध्यम कषायोका उत्कृष्ट अवस्थान किसके होता है ? ॥५५३॥ समाधान-जो तत्प्रायोग्य उत्कृष्ट अधःप्रवृत्तसंक्रमणके द्वारा वृद्धिको प्राप्त होकर तदनन्तरकालमे अवस्थित संक्रामक हुआ। उसके आठो मध्यम कषायोका उत्कृष्ट अवस्थान होता है ॥५५४॥ शंका-संज्वलनक्रोधकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? ॥५५५।। समाधान-जिस क्षपकके संज्वलनक्रोधका उत्कृष्ट सर्वसंक्रमण होता है, उसके ही संज्वलनक्रोधकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है ॥५५६॥ __चूर्णिसू०-उस ही जीवके तदनन्तरकालमे संज्वलनक्रोधकी उत्कृष्ट हानि होती है । विशेषता केवल यह है कि तदनन्तर समयमें उसके संक्रमणके योग्य जघन्य समयप्रबद्ध होना चाहिए। उनका स्पष्टीकरण इस प्रकार है-उत्कृष्ट वृद्धिके अनन्तर समयमें जिन आवलीमात्र नवकबद्ध समयप्रबद्धोके प्रदेशाग्र संक्रमित होगे, वे समयप्रवद्ध अपने बंधकालमें तत्प्रायोग्य जघन्य योगसे बंधे हुए होना चाहिए। इस प्ररूपणाके द्वारा उत्कृष्ट वृद्धिरूप प्रदेशाग्र सर्वसंक्रमणसे संक्रान्त होकर जिसके तदनन्तरकालमे पूर्वप्ररूपित ( आवलीमात्र नवकवद्ध
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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