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________________ ४४६ ___ कसाय पाहुड सुत्त . [५ संक्रम-अर्थाधिकार ५३२. सस्मत्तस्स उक्कस्सिया वड्डी कस्स १ ५३३. उबेल्लमाणयस्स चरिमसमए । ५३४. उक्कस्सिया हाणी कस्स ? ५३५. गुणिदकम्प्रंसियो सम्मत्तमुप्पाएदण लहुमिच्छत्तं गओ । तस्स पिच्छाइडिस्स परमसमए अवत्तव्यसंकमो, विदियसमए उक्कस्सिया हाणी । ५३६. सम्मामिच्छत्तस्स उक्कस्सिया वड्डी कस्स १ ५३७. गुणिदकम्मंसियस्स सव्वसंकामयस्स । ५३८. उक्कस्सिया हाणी कस्स ? ५३९. उप्पादिदे सम्मत्ते सम्मामिच्छत्तादो सम्मत्ते जं संकामेदि तं पदेसग्गमंगुलस्सासंखेज्जभागपडिभागं । ५४०. शंका-सम्यक्त्वप्रकृतिकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? ॥५३२॥ समाधान-सम्यक्त्वप्रकृतिकी उद्वेलना करनेवाले जीवके चरम स्थितिखंडके चरम समयमें सम्यक्त्वप्रकृतिकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है ॥५३३॥ शंका-सम्यक्त्वप्रकृतिकी उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? ॥५३४॥ समाधान-जो गुणितकर्माशिक जीव सम्यक्त्वको उत्पन्न करके लघुकालसे मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ। उस मिथ्यादृष्टिके प्रथम समयमे अवक्तव्यसंक्रमण होता है और द्वितीय समयमे उसके सम्यक्त्वप्रकृतिकी उत्कृष्ट हानि होती है ॥५३५॥ शंका-सम्यग्मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट वृद्धि किसके होती है ? ॥५३६॥ समाधान-गुणितकांशिक जीव जव सर्वसंक्रमणसे सम्यग्मिथ्यात्वको संक्रान्त करता है, तब उसके सम्यग्मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट वृद्धि होती है ॥५३७॥ शंका-सम्यग्मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट हानि किसके होती है ? ॥५३८॥ समाधान-उपशमसम्यक्त्वके उत्पन्न करनेपर सम्यग्मिथ्यात्वसे सम्यक्त्वप्रकृतिमे जो द्रव्य संक्रमित करता है, वह प्रदेशाग्र अंगुलके असंख्यातवे भागका प्रतिभागी है। सकमपजाएण वड्ढ्दूिण तदणतरसमए तत्तिय चेव सकामेमाणयस्स पयदसामित्तमविरुद्ध णेदव्व जाव दुचरिमसमए तप्पाओग्गुकस्सस कमवुड्ढीए वढि कादूण चरिमसमए उक्कस्सावट्ठाणपजाएण परिणदावलियसम्माइट्ठि त्ति । एत्तियो चेवुकस्सावट्ठाणसामित्तविसयो । जयध १ गुणिदकम्मसियलक्खणेणागतूण सम्मत्तमुप्पाइय सव्वुक्कस्सियाए पूरणाए सम्मत्तमावूरिय तटो मिच्छत्तं पडिवजिय सम्बरहस्सेणुव्वेल्लणकालेणुव्वेल्लमाणयस्स चरिमट्ठिदिखायचरिमसमए पयदुक्कस्ससामित्त होइ । तत्थ किंचूणसव्वसकमढव्वमेत्तस्स उक्कस्सवढिसरूवेणुवलद्धीदो। जयध० २ जो गुणिदकम्मसियोअतोमुहुत्तेण कम्म गुणेहिदि त्ति विवरीय गतूण सम्मत्तमुप्पाइय सव्वुक्कस्सियाए पूरणाए सम्मत्तमाऊरिय तदो सव्वलहु मिच्छत्त गदो, तस्स विदियसमयमिच्छाइट्ठिस्स उक्कस्सिया सम्मत्त पदेससकमहाणी होइ । कुदो; तत्थ पढमसमयअधापवत्तसंक्रमादो अवत्तव्यसलवादो विदियसमए हीयमाणसंकमदव्वस्स उवरिमासेसहाणिदव्य पेक्खिऊण बहुत्तोवलभादो । जयध० ३ उवसमसम्मत्ते समुप्पादिदे मिच्छत्तस्मेव सम्मामिच्छत्तस्स वि गुणसंकमो अस्थिचेव, उवसमसम्मत्तविदियसमयप्प हडि पडिसमयमसखेजगुणाए सेढीए सम्मामिच्छत्तादो सम्मत्तसरूवेण सकमपवुत्तीए बाहाणुवर लभादो। किंतु तहा संक्रममाणसम्मामिच्छत्तदव्वस्स पडिभागो अगुलस्सासखेजदिभागो । जयध० * ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'चरिमसमए' इस पदको टीकाका अग बना दिया है, जब कि इस पदका टोकाकारने स्वतत्र व्याख्या की है। (देखो पृ० १२८७ )
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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