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________________ कसायपाहुडसुत्त प० ६४, सू० १६. मिच्छत्त-सम्मामिच्छत्त-वारसकसायाणं जहएणट्ठिदिविहत्ती एगा ट्ठिदी दुसमयकालठिदिया ।' यही बात सूत्ररूपसे कम्मपयडीमे इस प्रकार कही हैसेसाण ठ्ठिई एगा दुसमयकाला अणुदयाणं ॥ १६ ॥ (कम्मप सत्ताधि०) पाठक दानोंकी समताके साथ सहज ही समझ सकेंगे कि उक्त चूर्णिका आधार कम्मपयडीकी यह गाथा है। (३) अनुभागविभक्तिमें मोहकर्मके तीन प्रकारके सत्कर्मस्थान इस प्रकार बतलाये गये हैं-- १० १७५, सू० १८६. संतकम्मट्ठाणाणि तिविहाणि-बंधसमुप्पत्तियाणि हदसमुप्पत्तियाणि हदहदसमुप्पत्तियाणि । १८७. सव्वत्थोवाणि बंधसमुप्पत्तियाणि । १८८. हदसमुप्पत्तियाणि असंखेज्जगुणाणि । १८६. हदहदसमुप्पत्तियाणि असंखेज्जगुणाणि । अर्थात् सत्कर्मस्थान तीन प्रकारके है-बन्धसमुत्पत्तिकस्थान, हतसमुत्पत्तिकस्थान और हतहतसमुत्पत्तिकस्थान । इनमें वन्धसमुत्पत्तिकस्थान सबसे कम हैं, उनसे हतसमुत्पत्तिकस्थान असंख्यातगुणित है और उनसे हतहतसमुत्पत्तिकस्थान असख्यातगुणित हैं। अब देखिए कि ऊपर जो बात कसायपाहुड-चूर्णिमे ४ सूत्रोंके द्वारा कही गई है, वही कम्मपयडीमे सूत्ररूपसे कितने संक्षेपमे कही गई है 'बंधहयहयहउप्पत्तिगाणि कमसो असंखगुणियाणि ।' ( कम्मप० सत्ताधि०) (४) प्रदेशविभक्तिमे प्रदेशसत्कर्मके जघन्य और उत्कृष्ट स्वामित्वसम्बन्धी जो चूर्णिसूत्र है, उन सवका आधार कम्मपयडीके सत्ताधिकारान्तर्गत प्रदेशसत्कर्मस्वामित्व-प्रतिपादक गाथाएं हैं, यह बात प्रदेशविभक्तिके पृ० १८५ से लेकर १६७ पृष्ठ तक दी गई टिप्पणियोंसे भलीभांति जानी जा सकती है। यहां केवल उनमें से एक उदाहरण दिया जाता है। कसायपाहुड-चूर्णिमें पृच्छापूर्वक जो नपुंसकवेदका उत्कृष्ट प्रदेशस्वामित्व बतलाया गया है, वह इस प्रकार है पृ. १८६, सू० १०. णवुसयवेदस्स उकस्सय पदेससंतकम्मं कस्स १ ११. गुणिदकम्मसियो ईसाणं गदो तस्स चरिमसमयदेवस्स उक्स्स यं पदेससंतकम्मं । अब इसका मिलान कम्मपयडीकी निम्न गाथासे कीजिएपरिसवरस्स उ ईसाणगस्स चरिमम्मिसमयम्मि ॥ २८ ॥ गाथा-पठित 'वरिसवरस्स' का अर्थ नपुसकवेद है । (५) कसायपाहुडकी संक्रमप्रकरण-सम्बन्धी न० २७ से ३६ तक की १३ गाथाए कुछ शब्दगत पाठ-भेदके साथ कम्मपयडीके संक्रमप्रकरणमें नं० १० से २२ तक ज्यों-की-त्यों पाई जाती हैं, यह बात पहले बताई जा चुकी है। दोनों ग्रन्थोंकी गाथाओंकी तुलनाके लिए कम्मपयडीकी इन गाथओको टिप्पणियोंमे दिया गया है, सो जिन्नासुयोको पृ०२६० से २७१ तकको कसायपाहुड की गाथाओंको और उनके नीचे टिप्पणीमें दी हुई कम्मपयडीकी गाथाओंको देखना चाहिए । (६) स्थिति संक्रमाधिकारमें स्थितिसंक्रमका अर्थपद इस प्रकार दिया है--
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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