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________________ प्रस्तावना यही सिद्ध होता है कि भूतबलिप्रणीत षटूखंडागमसूत्रका यतिवृपभ पर प्रभाव होते हुए भी कुछ सैद्धान्तिक मान्यताओंके विषयमे दोनोंका मतभेद रहा है । पर मत-भेद भले ही हो, किन्तु यतिवृषभके सामने पखंडागमका उपस्थित होना तो इससे सिद्ध ही है। यतिवृषभके सम्मुख षट्खंडागमके अतिरिक्त जो दूसरा आगम उपस्थित था वह है कर्म-साहित्यका महान् ग्रन्थ कम्मपयडी । इसके सग्रहकर्ता या रचयिता शिवशर्म नामके आचार्य हैं और इस ग्रन्थ पर श्वेताम्बराचार्योंकी टीकाओंके उपलब्ध होनेसे अभी तक यह श्वेताम्बर सम्प्रदायका ग्रन्थ समझा जाता है । किन्तु हाल में ही उसकी चूर्णिके प्रकाशमें आनेसे तथा प्रस्तत कसायपाहुड की चूर्णिका उसके साथ तुलनात्मक अध्ययन करनेसे इस बातमें कोई सन्देह नहींरह जाता है कि कम्मपयडी एक दिगम्बर-परम्पराका ग्रन्थ है और अज्ञात आचार्यके नामसे मुद्रित और प्रकाशित उसकी चूर्णि भी एक दिगम्बराचार्य इन्हीं यतिवृषभकी ही कृति है। कम्मपयडीचूर्णिकी तुलना कसायपाहुडकी चूर्णिके साथ आगे की जायगी। अभी पहले यह दिखाना अभी है कि यतिवृषभके सम्मुख कम्मपयडी थी और वे उससे अच्छी तरह परिचित थे, तथा उसका उन्होंने कसायपाहुडकी चूर्णिमें भरपूर उपयोग किया है। (१) कसायपाहडके 'पयडीए मोहणिज्जा' इतने मात्र बीज पदको आधार बनाकर चूर्णिकारने प्रकृतिविभक्ति नामक एक स्वतंत्र अधिकारका निर्माण किया है। उसमें मोहकर्मके १५ प्रकृतिस्थान इस प्रकार बतलाए गये है पृ० ५७ सू० ४०० पयडिट्ठाणविहत्तीए पुव्वं गमणिज्जा ठाणसमुक्त्तिणा। ४१. अत्थि अट्ठावीसाए सत्तावीसाए छव्वीसाए चउवीसाए तेवीसाए वावीसाए एकवीसाए तेरसण्हं वारसरहं एक्कारसण्हं पंचएहं चदुण्हं तिण्हं दोण्हं एक्किस्से च (१५) । अर्थात् मोहकर्मके २८, २७, २६, २४, २३, २२, २१, १३, १२, ११, ५, ४, ३, २ और १ प्रकृतिरूप पन्द्रह प्रकृतिसत्त्वस्थान होते हैं। उक्त प्रकृतिसत्त्वस्थानोंका आधार कम्मपयडीके सत्ताधिकारकी यह निम्न गाथा है एगाइ जाव पंचगमेक्कारस बार तेरसिगवीसा । विय तिय चउरो छस्सत्त अट्ठवीसा य मोहस्स ॥१॥ कम्मपयडीमें इसकी चूर्णि इस प्रकार है १, २, ३, ४, ५, ११, १२, १३, २१, २२, २३, २४, २६, २७, २८ एयाणि मोहणिज्जस्स संतकम्मट्ठाणाणि । ___ यतः गाथामे मोहके सत्त्वस्थान शब्द-संख्यामें बतलाए गये हैं, अतः चूर्णिकारने लाघवके लिए उन्हे उसकी चूर्णिमें अक-सख्यामें गिना दिये हैं । पर कसायपाहुडकी चूर्णिमें तो उक्त प्रकरण चूर्णिकार अपना स्वतंत्र ही लिख रहे हैं, अत उन्होंने वहां पर उन्हे शब्दोंमें पृथक्पृथक् गिनाना ही उचित समझा। इसी प्रकार स्थिति, अनुभाग और प्रदेशविभक्तिके चूणिसूत्रोंका आधार कम्मपयडीके सत्ताधिकारकी गाथाएँ है, यह बात दोनोंकी तुलनासे भलीभांति ज्ञात हो जाती है। (२) स्थितिविभक्तिमें मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और अनन्तानुवन्धी आदि बारह कपायोकी जघन्य स्थितिविभक्ति इस प्रकार बतलाई गई है
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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