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________________ ४३० कसाय पाहुड सुत्त . [५ संक्रम-अर्थाधिकार ३२२. अधवा सम्मत्तमुप्पादेमाणयस्स वा तदो खवेमाणयस्स वा जो गुणसंकमकालो सो वि भुजगारसंकामयस्स कायव्यो । ३२३. अप्पदरसंकामगो केवचिरं कालादोहोदि ? ३२४. जहण्णेण अंतोमुहत्तं । ३२५. एयसमओ वा । ३२६. उक्कस्सेण छावटिसागरोवमाणि सादिरेयाणि । ३२७. अवत्तव्यसंकमो केवचिरं कालादो होदि ? ३२८. जहण्णुक्कस्सेण एयसमओ। , ३२९. अणंताणुबंधीणं' भुजगारसंकामगो केवचिरं कालादो होदि ? ३३०. जहण्णेण एयसमयो। ३३१. उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेन्जदिभागो । ३३२. अप्पदरसंकमो केवचिरं कालादो होदि १ ३३३. जहण्णेण एयसमओ । ३३४. उक्कस्सेण वे छावट्ठिसागरोवमाणि सादिरेयाणि । ३३५. अवट्ठिदसंकमो केवचिरं कालादो होदि ? ३३६. जहण्णेण एयसमओ । ३३७. उक्स्से ण संखेज्जा समया । ३३८. अवत्तव्यसंकामगो करनेवालेका, अथवा मिथ्यात्वको क्षपण करनेवालेका जो गुणसंक्रमणकाल है, वह भी सम्यग्मिथ्यात्वके भुजाकारसंक्रामकका काल प्ररूपण करना चाहिए ।।३२१-३२२॥ शंका-सम्यग्मिथ्यात्वके अल्पतरसंक्रमणका कितना काल है ? ॥३२३॥ समाधान-जघन्य अन्तर्मुहूर्त, अथवा एक समय है और उत्कृष्ट काल सातिरेक च्यासठ सागरोपम है ॥३२४-३२६॥ शंका-सम्यग्मिथ्यात्वके अवक्तव्यसंक्रमणका कितना काल है ? ॥३२७॥ समाधान-जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है ॥३२८॥ शंका-अतन्तानुबन्धी कपायोके भुजाकारसंक्रमणका कितना काल है ? ॥३२९॥ समाधान-जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल पल्योपमके असंख्यातवे भागप्रमाण है ॥३३०-३३१॥ शंका-अनन्तानुवन्धी कषायोके अल्पतरसंक्रमणका कितना काल है ? ॥३३२॥ समाधान-जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल सातिरेक दो वार छयासठ सागरोपम है ॥३३३-३३४॥ शंका-अनन्तानुवन्धी कपायोके अवस्थितसंक्रमणका कितना काल है ? ॥३३५॥ समाधान-उक्त कपायोके जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है ।।३३६-३३७॥ १ कुदो, गुणस कमविसए मुजगारसकम मोत्तण पयारतरासभवादो | जयध० २ तं जहा-चरिमुव्वेलणकडय गुणसकमेण सकामेंतरण सम्मत्तमुप्पाइद । तस्स पढमसमए विज्झा. देणप्पयरसकमो जादो । पुणो विदियसमए गुणसकमपारभेण भुजगारसकमो जादो। लद्धो एयसमयमत्ता सम्मामिच्छत्तप्पयरसकमवालो | जयध० ३ त जहा-थावरकायादो आगतूण तसकाइएसुप्पण्णस्स जाव पलिदोवमासखेजभागमेत्तकालो गच्छदि ताव आगमो बहुगो, णिजरा थोवयरा होइ; तम्हा पलिटोबमासखेचभागमेत्तो पयदभुजगारसकमुक्कस्सकालो ण विरुज्झदे । जयध० ४ आगमणिजराणं सरिसत्तवसेण सत्तट्ठसमएसु अवटिटदसकमसभवे विरोहाभावादो | जयध
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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