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________________ गा० ५८] - प्रदेशसंक्रम-भुजाकार-काल-निरूपण ४२९ होदि ? ३०८. जहणणेण एयसमओ। ३०९. उक्कस्सेण संखेजा समया । ३१०. अवत्तव्यसंकमो केवचिरं कालादो होदि १ ३११. जहण्णुक्कस्सेण एयसमओ । ३१२. सम्मत्तस्स भुजगारसंकमो केवचिरं कालादो होदि १ ३१३. जहण्णेण एयसमओ । ३१४. उक्कस्सेण अंतोमुत्तं । ३१५. अप्पयरसंकमो केवचिरं कालादो होदि ? ३१६. जहण्णेण अंतोमुहुत्तं । ३१७. उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेजदिभागो । ३१८. अवत्तव्यसंकमो केवचिरं कालादो होदि १ ३१९, जहण्णुक्कस्सेण एयसमयो । ३२०. सम्मामिच्छत्तस्स भुजगारसंकमो केवचिरं कालादो होदि ? ३२१. एको वा दो वा समया । एवं समयुत्तरो उकस्सेण जाव चरिमुवेल्लणकंडयुक्कीरणा त्ति । समाधान-मिथ्यात्वके अवस्थितसंक्रमणका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है ॥३०८-३०९।। शंका--मिथ्यात्वके अवक्तव्यसंक्रमणका कितना काल है ? ॥३१०॥ समाधान-मिथ्यात्वके अवक्तव्यसंक्रमणका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है ।।३११॥ शंका-सम्यक्त्वप्रकृतिके भुजाकारसंक्रमणका कितना काल है १ ।।२१२।। समाधान-जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है ।।३१३-३१४॥ शंका-सम्यक्त्वप्रकृतिके अल्पतरसंक्रमणका कितना काल है ? ।।३१५।। समाधान-जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्टकाल पल्योपमके असंख्यातवे भागप्रमाण है ॥३१६-३१७॥ शंका-सम्यक्त्वप्रकृतिके अवक्तव्यसंक्रमणका कितना काल है ? ॥३१८।। समाधान-जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समयमात्र है ।।३१९।। शंका-सम्यग्मिथ्यात्वके भुजाकारसंक्रमणका कितना काल है ? ॥३२०॥ समाधान-एक समय भी होता है, दो समय भी होता है, इस प्रकार एक-एक समय अधिकके क्रमसे बढ़ते हुए उत्कर्षसे चरम उद्वेलनाकांडकके उत्कीर्ण होने तक अन्तर्मुहूर्तप्रमाण भी सम्यग्मिथ्यात्वक भुजाकारसंक्रमणका उत्कृष्ट काल है। अथवा सम्यक्त्वको उत्पन्न पुवकरणपढमसमए गुणसकमपारभेणाप्पयरसकमस्स पजवसाण होइ । तदो सपुण्णछावठिसागरोवममेत्त वेदगसम्मत्तुक्कस्सकालम्मि अपुव्वाणियट्टिकरणद्धामेत्तमप्पयरसकमस्स ण लव्भइ त्ति । तम्मि पुधिल्लोवसमसम्मत्तकालभतरअप्पयरकालादो सोहिदे सुद्धसेसमेत्तेयसादिरेयछावसिागरोवमपमाणो पयदुक्कस्मकालवियप्पो समुवलद्धो होइ । जयध० १ सम्माइट्ठिपढमसमय मोत्तूणण्णत्थ तदभावविणिण्णयादो । जयध० २ कुदो, चरिमुवेल्लणकडए सव्वत्थेव गुणसकमेण परिणदम्मि पयदभुजगारसमुक्कत्सकालस्स तप्पमाणत्तोवलभादो । जयध० ३ कुदो; सम्मत्तादो मिच्छत्त गतूण सवुक्कस्सेणुव्वेल्लणकालेणुव्वेल्लमाणयस्स तदुवल भादो । जयध० ४ सम्मत्तादो मिच्छत्तमुवगयस्स पढमसमयादो अण्णत्थ तदभावविणिण्णयादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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