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________________ कसाय पाहुड सुत्त विसेसाहिओ । २४४. लोभे जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । 3 २४५. पुरिसवेदे जहण्णपदेससंकमो अनंतगुणों । २४६. इत्थवेदे जहण्णपदेससंकमो संखेज्जगुणो । २४७. हस्से जहण्णपदेससंकमो संखेज्जगुणो । २४८. रदीए जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । २४९. सोगे जहण्णपदेस संकमो संखेज्जगुणो । २५०. अरदीए जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । २५१. वुंसयवेदे जहण्णपदेस संकमो विसेसाहिओ । २५२. दुर्गुछाए जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । २५३. भए जहणपदेससंकमो विसेसाहिओ । २५४. माणसजलणे जहण्णपदेस संकमो विसेसाहिओ । २५५. कोहे जहणपदेस संकमो विसेसाहिओ । २५६. मायाए जहणपदेससंकमो विसेसाहिओ । २५७ लोहे जहण्णपदेस संकमो विसेसाहिओ । २५८. भुजगारस्स अट्ठपदं । २५९. एहि पदेसे बहुदरगे संक्रामेदित्ति उसकाविदे अप्पदरसंकामदो एसो भुजगारसंकमो | २६०. एहि पदेसे अप्परगे क्रोध से प्रत्याख्यानमायामे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । प्रत्याख्यानमायासे प्रत्याख्यानलोभमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है ।। २३१-२४४॥ I चूर्णिसू० - प्रत्याख्यानलोभसे पुरुपवेद मे जघन्य प्रदेशसंक्रमण अनन्तगुणित होता है । पुरुषवेदसे स्त्रीवेद मे जघन्य प्रदेशसंक्रमण संख्यातगुणित होता है । स्त्रीवेद से हास्यमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण संख्यातगुणित होता है । हास्यसे रतिमे जघन्य प्रदेश संक्रमण विशेष अधिक होता है । रतिसे शोकमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण संख्यातगुणित होता है । शोकसे अरतिमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । अरतिसे नपुंसक वेद में जवन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । नपुंसकवेदसे जुगुप्सामे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । जुगुप्सा से भयमें जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । भय से संज्वलनमान में ' जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । संज्वलनमानसे संज्वलनक्रोधमें जघन्य प्रदेश - संक्रमण विशेष अधिक होता है । संज्वलनक्रोधसे संज्वलनमायामे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । संज्वलनमायासे संज्वलनलोभमें जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है ॥२४५-२५७॥ ४२२ [ ५ संक्रम-अर्थाधिकार चूर्णि सू० [० - अव प्रदेशसंक्रमण सम्बन्धी भुजाकार कहते है । है । अनन्तर-व्यतिक्रान्त समयमें अल्पतरसंक्रमण करके इस समय बहुतर कर्मप्रदेशका संक्रमण करता है, यह भुजाकार संक्रमण है । ( उसका यह अर्थपद वर्तमान समय ) में अनन्तर - व्यतिक्रान्त १ कुदो, देसघादिकारणावेक्खित्तादो । जयध० २ कुदो, बधगद्वावसेण तावदिगुणत्तोवलभादो | जयध० ३ कुदो; पुव्विल्लव धगद्धादो सखेजगुणवधगद्वार सचिददव्वाणुसारेण सकमपवृत्तिअभुवगमाटो | ४ कुदो उण तारिसस्स संकमभेदस्स भुजगारववएसो ? ण, बहुदरीकरण च भुजगारो त्ति तस्स तथ्यवसोववत्तदो । जयध० * ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'संखेज्जगुणो' के स्थानपर 'विसेसाहिओ' पाठ मुद्रित है । पर टीकाकै अनुसार वह अशुद्ध है । ( देखो पृ० १२४० ) 1
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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