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________________ गा० ५८ ] प्रदेश संक्रम- अल्पबहुत्व-निरूपण ४२१ २२९. जहा णिरयगईए, तहा तिरिक्खगईए । २३०. देवगईए णाणत्तं; सवेदादो इत्थवेदो असंखेज्जगुणो' । २३१. एइ दिए सव्वत्थोवो सम्मत्ते जहण्णपदेससंकमो । २३२. सम्मामिच्छत्ते जहण्णपदेससंकमो असंखेज्जगुणो । २३३. अनंताणुवंधिमाणे जहण्णपदेस संकमो असंखेज्जगुणो' । २३४. कोहे जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । २३५. मायाए जहणपदेस संकमो विसेसाहिओ । २३६. लोहे जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । २३७. अपञ्चकखाणमाणे जद्दण्णपदेससंकमो असंखेज्जगुणो । २३८. कोहे जहणपदेस संकमो विसेसाहिओ । २३९. मायाए जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । २४०. लोभे जहण्णपदेस संकमो विसेसाहिओ । २४१. पञ्चक्खाणमाणे जहण्णपदेस संकमो विसेसाहिओ । २४२. कोहे जहण्णपदेस संकमो विसेसाहिओ । २४३. मायाए जहण्णपदेस संकमो 3 चूर्णिसू० - जिस प्रकार नरकगतिमे यह जघन्य प्रदेश संक्रमणका अल्पबहुत्व कहा है, उसी प्रकार से तिर्यचगतिमे भी जानना चाहिए । ( मनुष्यगतिका जघन्य प्रदेश संक्रमण - सम्बन्धी अल्पबहुत्व ओघके समान है । ) देवगतिमे कुछ विभिन्नता है, वहॉपर नपुंसकवेदसे स्त्रीवेदका जघन्य प्रदेशसंक्रमण असंख्यातगुणित होता है ।। २२९-२३०॥ " चूर्णिसू० - इन्द्रियमार्गणाकी अपेक्षा एकेन्द्रियो में सम्यक्त्वप्रकृतिमे जघन्य प्रदेशसंक्रसबसे कम होता है । सम्यक्त्व प्रकृति से सम्यग्मिथ्यात्व में जघन्य प्रदेशसंक्रमण असंख्यातगुणित होता है । सम्यग्मिथ्यात्व से अनन्तानुबन्धी मानमे जन्नन्य प्रदेशसंक्रमण असंख्यातगुणित होता है । अनन्तानुबन्धी मानसे अनन्तानुबन्धी क्रोधमे जघन्य प्रदेश संक्रमण विशेष अधिक होता है । अनन्तानुवन्धी क्रोध से अनन्तानुवन्धी मायामे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । अनन्तानुबन्धी मायासे अनन्तानुबन्धी लोभमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । अनन्तानुबन्धी लोभसे अप्रत्याख्यान मानमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण असंख्यातगुणित होता है । अप्रत्याख्यानमानसे अप्रत्याख्यानक्रोधमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । अप्रत्याख्यानक्रोधसे अप्रत्याख्यानमायामें जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । अप्रत्याख्यानमायासे अप्रत्याख्यानलोभमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । अप्रत्याख्यानलोभसे प्रत्याख्यानमान में जघन्यप्रदेश संक्रमण विशेष अधिक होता है । प्रत्याख्यानमानसे प्रत्याख्यानक्रोधमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । प्रत्याख्यान १ (कुदो, ) रियाईए तिरिक्खगईए च इत्थवेदादो णवसयवेदस्स असखेज्जगुणत्तोवलभादो । २ कुदो; अधापवत्तभागहारवग्गेण खडिददिवड्ढ गुणहाणिमेत्तजहणसमयपत्रद्धपमाणत्तादो । तपि कुदो ! विसजोयणापुव्त्रसजोगेण सेसकसाएहिंतो अधापवत्तसकमणेण पडिच्छिदखविदकम्मसियदव्वेण सह समयाविरोहेण सव्वल हुमेइ दिएसुप्पण्णस्स पढमसमए अधापवत्तसकमेण पयटजणसामित्तावलवणादो । ३ कुदो, खविदकम्मसियलक्खणेणागतूण दिवड् ढगुणहाणिमेत्तजद्दण्णसमयपत्रद्धेहिं सह एइदिएसुप्पण्णपढमसमए अधापवत्तसकमेण पडिलद्वजहण्णभावत्तादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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