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________________ ४२० कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार जहण्णपदेससंकयो विसेसाहिओ । २११. लोभे जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । २१२. पच्चक्खाणमाणे जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । २१३. कोहे जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । २१४. मायाए जहण्णपदेससंकयो विसेसाहिओ । २१५. लोभे जहण्णपदेससंक्रमो विसेसाहिओ। २१६. इत्थिवेदे जहण्णपदेससंक्रमो अणंतगुणो'। २१७. ण,सयवेदे जहण्णपदेससंकमो संखेज्जगुणो । २१८. पुरिसवेदे जहण्णपदेससंकमो असंखेज्जगुणो । २१९. हस्से जहण्णपदेससंकमो संखेज्जगुणो । २२०. रदीए जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । २२१. सोगे जहण्णपदेससंकमो संखेज्जगुणो । २२२. अरदीए जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । २२३. दुगुंछाए जहण्णपदेससंक्रमो विसे साहिओ । २२४. भये जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ। २२५. माणसंजलणे जहण्णपदेससंकयो विसेसाहिओ। २२६. कोहसंजलणे जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ। २२७. मायासंजलणे जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । २२८. लोहसंजलणे जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । अप्रत्याख्यान लोभमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेप अधिक होता है। अप्रत्याख्यानलोभसे प्रत्याख्यानमानमें जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेप अधिक होता है। प्रत्याख्यानमानसे प्रत्याख्यान क्रोधमें जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। प्रत्याख्यानक्रोधसे प्रत्याख्यानमायामे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। प्रत्याख्यानमायासे प्रत्याख्यानलोभमें जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है ॥२०१-२१५।। चूर्णिसू०-प्रत्याख्यानलोभसे स्त्रीवेदमे जघन्यप्रदेशसंक्रमण अनन्तगुणित होता है । स्त्रीवेदसे नपुंसकवेदमै जघन्य प्रदेशसंक्रमण संख्यातगुणित होता है । नपुंसकवेदसे पुरुपवेदमें जघन्य प्रदेशसंक्रमण असंख्यातगुणित होता है। पुरुपवेदसे हास्यमें जघन्य प्रदेशसंक्रमण संख्यातगुणित होता है । हास्यसे रतिमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेप अधिक होता है । रतिसे शोकमें जघन्य प्रदेशसंक्रमण संख्यातगुणित होता है । शोकसे अरतिमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेप अधिक होता है। अरतिसे जुगुप्सामे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । जुगुप्सासे भयमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेप अधिक होता है । भयसे संज्वलनमानमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेप अधिक होता है। संज्वलनमानसे संज्वलनक्रोधमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेप अधिक होता है। संज्वलनक्रोधसे संज्वलनमायामे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। संज्वलनमायासे संज्वलनलोभमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेप अधिक होता है ।।२१६-२२८॥ १ जइ वि सम्मत्तगुणपाहम्मेणित्थीवेदस्स बधवोच्छेट कादूण तेत्तीससागरोवमाणि देसूणाणि गालिय विज्ञादसंकमेण जहण्णसा मित्त जाद, तो वि देसघादिमाहयेणाणतगुणत्तमेदस्स पुबिल्लादो ण विरुज्झदे । २ कुदो, बंधगद्धावसेणेदस्स तत्तो सखेज्जगुणन पडि विरोहाभावादो । जयध० ३ कुदो खविदकम्म सियलक्खणेणागतूण जेरइएसुप्पण्णस्स पडिवखवधगधामेत्तगलणेण पुरिस वेदस्स अधापवत्तसकमणिबधणजहण्णसामित्तावलंबणादो । जयध० __ ४ कुदो, बंधगद्धापडिबद्धगुणगारस तहाभावोवलभादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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