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________________ गा० ५८ ) प्रदेशसंक्रम-अल्पबहुत्व-निरूपण ४१९ १९६. हस्से जहण्णपदेससंकमो असंखेज्जगुणो'। १९७. रदीए जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । १९८. दुगंछाए जहण्णपदेससंकमो संखेज्जगुणो । १९९. भए जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । २००. लोभसंजलणे जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । २०१. णिरयगईए सव्वत्थोवो सम्मत्ते जहण्णपदेससंकयो । २०२. सम्मामिच्छत्ते जहण्णपदेससंकमो असंखेज्जगुणो। २०३. अणंताणुवंधियाणे जहण्णपदेससंकयो असंखेज्जगुणो । २०४. कोहे जहण्णपदेससंकपो विसेसाहिओ । २०५. मायाए जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ। २०६. लाभे जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ। २०७. मिच्छत्ते जहण्णपदेमसंक्रमो असंखेज्जगुणों । २०८. अपञ्चक्खाणमाणे जहष्णपदेससंकमो असंखेज्जगुणो। २०९. कोहे जहण्णपदेससंकमो विसे साहिओ। २१०. मायाए प्रदेशसंक्रमण विशेप अधिक होता है। संज्वलनमायासे हास्यमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण असंख्यातगुणित होता है। हारयसे रतिमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेप अधिक होता है। रतिसे जुगुप्सामे जघन्य प्रदेशसंक्रमण संख्यातगुणित होता है । जुगुप्सासे भयमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। भयसे संज्वलनलोभमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है ।।१८८-२००॥ चूर्णिसू०-गतिमार्गणाकी अपेक्षा नरकगतिमे सम्यक्त्वप्रकृतिमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण सबसे कम होता है । सम्यक्त्वप्रकृतिसे सम्यग्मिथ्यात्वमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण असंख्यातगुणित होता है । सम्यग्मिथ्यात्वसे अनन्तानुबन्धी मानमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण असंख्यातगुणित होता है। अनन्तानुबन्धी मानसे अनन्तानुबन्धी क्रोधमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेप अधिक होता है। अनन्तानुवन्धी क्रोधसे अनन्तानुबन्धी मायासे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेप अधिक होता है । अनन्तानुवन्धी मायासे अनन्तानुबन्धी लोभमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । अनन्तानुवन्धी लोभसे मिथ्यात्वमें जघन्य प्रदेशसंक्रमण असंख्यातगुणित होता है । मिथ्यात्वसे अप्रत्याख्यानमानमे जघन्यप्रदेशसंक्रमण असंख्यातगुणित होता है । अप्रत्याख्यानमानसे अप्रत्याख्यानक्रोधमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेप अधिक होता है । अप्रत्याख्यानक्रोधसे अप्रत्याख्यानमायामे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है। अप्रत्याख्यानमायासे १ कुदो, अधापवत्तभागहारोवट्टिददिवड्ढगुणहाणिमेत्तइदियसमयपबधेसु असखेज्जाण पचिंदियसमयपबद्धाणमुवलभादो। जयध० २ कुदो, हस्स-रदिपडिवक्खबधकाले वि दुगुछाए वधमभवादो । जयध० ३ केत्तियमेत्तण १ च उभागमेत्तण ? कुदो; णोकसायपंचभागमेत्तण भयदव्येण कसायच उभागमेत्तलोहसजलणजहण्णसकमदव्वे ओवट्टिदे सचउभागेगरूवागमदसणादो । जयध० ४ दोण्हमेदेसि जइ विथोवूण तेत्तीससागरोत्रममेत्तगोवुच्छगालणेण सम्माइट्ठिचरिमसमयम्मि विज्झादसकमेण जहण्यसामित्तपविसि तो वि पुग्विल्लादो एदस्सासखेज्जगुणत्तमविरुद्ध, अधापवत्तभागहारसभवासभवकयविसेसोववत्तीदो| जयघ० ५कि कारणं १ खविदकम्मसियलसणागतूण णेरइएसुप्पण्णपदमसमए अधापवत्तसक मेणेदस्स सामित्तावलवणादो । जयप.
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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