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________________ ૮ कसाथ पाहुड सुप्त [ ५ संक्रम-अर्थाधिकार विसेसाहिओ । १८२. मायाए जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । १८३. लोहे जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । १८४. पचकखाणमाणे जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । १८५. कोहे जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । १८६. मायाए जहण्णपदेस संकमो विसेसाहिओ । १८७. लोभे जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । 3 १८८. वेदे जहणपदेससंकमो अनंतगुणो । १८९. इत्थवेदे जहणपदेसको असंखेज्जगुणो । १९०. सोगे जहण्णपदेस संकमो असंखेज्जगुणो । १९१. अरदीए जहण्णपदेससंकमो विसेसाहिओ । १९२. कोहसंजलणे जहण्णपदेससंकमो असंखेज्जगुणो ' । १९३. माणसंजलणे जहण्णपदेस संकमो विसेसाहिओ " । १९४ पुरिसवेदे जहण्णपदेससंकमो घिसे साहिओ । १९५. मायासंजलणे जहण्णपदेस संक्रमो विसं साहिओ । ४ विशेष अधिक होता है । अप्रत्याख्यानक्रोध से अप्रत्याख्यानमाया में जघन्य प्रदेश संक्रमण विशेष अधिक होता है । अप्रत्याख्यानमायासे अप्रत्याख्यानलोभ में जघन्य प्रदेश संक्रमण विशेष अधिक होता है । अप्रत्याख्यानलोभसे प्रत्याख्यानमान में जघन्य प्रदेश संक्रमण विशेष अधिक होता है । प्रत्याख्यानमानसे प्रत्याख्यानक्रोधमे जवन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । प्रत्याख्यानक्रोध से प्रत्याख्यानमायामे जघन्य प्रदेश संक्रमण विशेष अधिक होता है । प्रत्याख्यान मायासे प्रत्याख्यानलोभ में जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है ॥ १७२-१८७॥ I चूर्णिसू० - प्रत्याख्यानलोभसे नपुंसक वेदसे जघन्य प्रदेशसंक्रमण अनन्तगुणित होता है । नपुंसक वेदसे खीवेद में जघन्य प्रदेशसंक्रमण असंख्यातगुणित होता है । खीवेदसे शोक मे जघन्य प्रदेशसंक्रमण असंख्यातगुणित होता है । शोकसे अरतिमे जघन्य प्रदेश संक्रमण विशेष अधिक होता है । अरतिसे संज्वलनक्रोधमें जघन्य प्रदेशसंक्रमण असंख्यातगुणित होता है । संज्वलनक्रोध से संज्वलनमानमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । संज्वलनमान से पुरुपवेदमे जघन्य प्रदेशसंक्रमण विशेष अधिक होता है । पुरुषवेदसे संज्वलनमायामे जघन्य १ जइ वि तिपलिदोवमाहियवेच्छावटि सागरोवमाणि परिगालिय णघुसवेदस्स जहण्णसामित्त जाद, तो वि पुल्लिदव्वादो अणतगुणमेव णवसयवेददव्व होर, देसघाइपडिभागियत्तादो | जयघ० २ कुदो णत्रुसयवेद जहण्णसामियस्से विस्थिवेदजहण्णसाभियस्स तिसु पलिदोवमेसु परिभमणाभा वादो | जयध० ३ कुदो; इत्थवेदजहण्णसामियत्सेव पयदजहण्णसामियस्त वेछावसिागरोवमाण परिभ्रमणादो । ४ कुदो, विज्झादभागहारोवट्टिददिवड्ठगुणहाणिमेत्त इदियसमयपत्रद्धेहिंतो अधापवत्तभागद्दारोवट्टिदपचिदियसमयपत्रद्धस्सासखेज्जगुणत्त वलभादो | जयध० ५ किं कारण ? कोहसजलणदव्वमेव समयपवद्धस्स चउवभागमेत्त, माणसजलणदव्व पुण तत्तियभागमेन्त, तेण विसेसाहिय जाद | जयघ० ६ कुदो; समयपत्रद्धदुभागप्रमाणत्तादो । जयध० ७ कुदो; दोण्ह पि समयपवद्धपमाणत्ताविसेसे बि गोकसायभागादो कसायभागस्स पर्याडिविसेस - मेत गाहियत्तदसणादो | अवध
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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