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________________ ४०८ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार अणंताणुवंधिणो च विसंजोइदा। पुणो मिच्छत्तं गंतूण अंतोमुहुत्तं संजोएदूण पुणो तेण सम्मत्तं लद्ध। तदो सागरोवमवेछावट्ठीओ अणुपालिदं । तदो विसंजोएदुमाडत्तो । तस्स अधापवत्तकरणचरिमसमए अणंताणुवंधीणं जहण्णओ पदेससंकमो। ५३. अट्ठण्हं कसायाणं जहण्णओ पदेससंकमो कस्स ? ५४. एइंदियकम्मेण जहण्णएण तसेसु आगदो संजमासंजमं संजमं च बहुसो गदो। चत्तारि वारे कसाए उवसामित्ता तदो एइदिएसु गदो। असंखेजाणि वस्साणि अच्छिदो जाव उवसामयसमयपबद्धा णिग्गलंति । तदो तसेसु आगदो संजमं सबलहुलद्धो । पुणो कसायक्खवणाए उवद्विदो । तस्स अधापवत्तकरणस्स चरिमसमए अट्ठण्हं कसायाणं जहण्णओ पदेससंकमो' । ५५. एवमरइ-सोगाणं । ५६. हस्स-रइ-भय-दुगुंछाणं पि एवं चेव, णवरि अपुवकरणस्सावलियपविट्ठस्स । ५७. कोहसंजलणस्स जहण्णओ पदेससंकमो कस्स ? ५८. उवसामयस्स चरिमसमयपवद्धो जाधे उवसामिजमाणो उवसंतो ताधे तस्स कोहसंजलणस्स जहण्णओ प्राप्त किया । तब उसने दो वार छयासठ सागरोपम कालतक सम्यक्त्वका परिपालन किया । तदनन्तर अनन्तानुवन्धीकी विसंयोजना आरम्भ की। ऐसे जीवके अधःप्रवृत्तकरणके चरम समयमें अनन्तानुवन्धी कषायोका जघन्य प्रदेशसंक्रमण होता है ॥५२॥ शंका-आठो मध्यम कपायोका जघन्य प्रदेशसंक्रमण किसके होता है ? ॥५३॥ समाधान-जो जीव एकेन्द्रियोके योग्य जघन्य सत्कर्मके साथ बसोमे आया । वहॉपर संयमासंयम और संयमको वहुत वार प्राप्त हुआ। चार वार कपायोका उपशमन करके तदनन्तर एकेन्द्रियोमे गया । पहॉपर जितने समयमे उपशामककालमे बँधेहुए समयप्रवद्ध गलते है, उतनी असंख्यात वर्षों तक रहा। तदनन्तर सोमे आया और सर्वलघुकालसे संयमको प्राप्त हुआ । पुनः कपायोकी क्षपणाके लिए उद्यत हुआ। ऐसे जीवके अधःप्रवृत्तकरणके चरम समयमे आठो मध्यम कपायोंका जघन्य प्रदेशसंक्रमण होता है ॥५४॥ चूर्णिसू०-इसी प्रकारसे अरति और शोकके जघन्य प्रदेशसंक्रमणका स्वामित्व जानना चाहिए। हास्य, रति, भय और जुगुप्साका जघन्य प्रदेशसंक्रमण-स्वामित्व भी इसी प्रकारसे जानना चाहिए। विशेपता केवल यह है कि इन कर्मोंका जघन्य प्रदेशसंक्रमण ( अधःप्रवृत्तकरणके चरम समयमे न होकर ) अपूर्वकरणमे प्रवेश करनेवाले जीवके प्रथम आवलीके चरम समयमे होता है ।।५५-५६।। शंका-संज्वलन क्रोधका जघन्य प्रदेशसंक्रमण किसके होता है ? ॥५७॥ समाधान-उपशामकके संचलनक्रोधके चरम समयमे बँधा हुआ समयप्रबद्ध जव उपशमन किया जाता हुआ उपशान्त होता है, उस समय उसके संज्वलन क्रोधका जघन्य प्रदेशसंक्रमण होता है ।।५८॥ १ अट्ठकसायासाए असुमधुववंधि अस्थिरतिगे य । सब्बलहुँ खवणाए अहापवत्तस्स चरिमम्मि ॥१०२॥ कम्मप० प्रदेशमं०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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