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________________ गा० ५८ ] प्रदेश संक्रम- स्वामित्व-निरूपण ४०७ ४९. सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं जहण्णओ पदेससंकमो कस्स १५०. एसो चेव जीवो मिच्छतं गदो । तदो पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागं गंतूण अप्पप्पणो दुरिमडिदिखंडयं चरिमसमय- उच्बेल्लमाणयस्स तस्स जहण्णओ पदेस संकमो' । ५१. अणंताणुबंधीणं' जहण्णओ पदेस संकमो कस्स १५२. एइ दियकम्मेण जहण्णण तसेसु आगदो । संजमं संजमा संजमं च बहुसो लद्धा चत्तारि वारे कसाए उवसामत्ता तदो एइ दिए पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागमच्छिदो जाव उवसामयसमयपत्रद्धा णिग्गलिदा ति । तदो पुणो तसेसु आगदो सन्चलहु सम्मत्तं लद्ध' अन्तर्मुहूर्त से सम्यक्त्वको प्राप्त हुआ । दश हजार वर्ष तक सम्यक्त्वके साथ जीवित रहकर अन्तमे मिथ्यात्वको प्राप्त होकर मरा और बादर पृथिवीकायिकोमे उत्पन्न हुआ । वहाँसे अन्तर्मुहूर्तमे ही निकलकर मनुष्योमे उत्पन्न हुआ औप उनमे सम्यक्त्व और संयमासंयमको धारण किया । इस प्रकार वह असंख्य वार देव और मनुष्योमे उत्पन्न होकर पल्योपमके असंख्यातवे भाग वार सम्यक्त्व और संयमासंयमको, आठ वार संयम और अनन्तानुबन्धीकी विसंयोजनाको, तथा चार वार उपशमश्रेणीको प्राप्त हुआ । अन्तिम मनुष्य भव उत्पन्न होकर जो लघुकालसे ही मोह-क्षपणा के लिए उद्यत होता है, वह जीव क्षपितकर्माशिक कहलाता है । शंका-सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वका जघन्य प्रदेशसंक्रमण किसके होता है ? ॥४९॥ · समाधान- यही उपयुक्त क्षपितकर्माशिक जीव ( दर्शनमोहकी क्षपणाके लिए उद्यत होनेके पूर्व ही ) मिध्यात्वको प्राप्त हुआ । ( वहॉपर अन्तर्मुहूर्त के पश्चात् सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वकी उद्वेलना प्रारम्भ कर और ) पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाणकाल तक उद्वेलना करके उक्त दोनो कर्मोंके अपने-अपने द्विचरम स्थितिखंड के चरम समयवर्ती द्रव्यकी जब वह उद्वेलना करता है, तब उसके सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वका जघन्य प्रदेशसंक्रमण होता है ॥५०॥ शंका - अनन्तानुबन्धी कषायोका जघन्य प्रदेशसंक्रमण किसके होता है ? ॥ ५१ ॥ समाधान- जो जीव एकेन्द्रियोंके योग्य जघन्य सत्कर्मके साथ सोमे आया । वहॉपर संयम और संयमासंयमको बहुत बार प्राप्त कर और चार वार कषायोका उपशमन करके तदनन्तर एकेन्द्रियोमे पल्योपमके असंख्यातवे भागकाल तक रहा- जबतक कि उपशामक - कालमे बँधे हुए समयप्रबद्ध निर्गलित हुए । तदनन्तर वह पुनः त्रसोमे आया, और सर्वलघु कालसे सम्यक्त्वको प्राप्त किया और अनन्तानुबन्धीकी विसंयोजना की । पुनः मिथ्यात्वको प्राप्त होकर और अन्तर्मुहूर्त तक अनन्तानुबन्धीकी संयोजना करके पुनः उसने सम्यक्त्वको १ हस्स गुणसंकमद्धाइ पूरियित्ता समीस-सम्मत्तं । चिरसंमत्ता मिच्छत्तगयस्सुव्वलणयोगे सिं ॥ १०० ॥ कम्मप० प्रदेशस
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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