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________________ ४०६ कसाथ पाहुड सुत्त [ ५ संक्रम-अर्थाधिकार पडिवण्णो संजमं संजमा संजमं च बहुसो लभिदाउगो चत्तारि वारे कसाए उवसामित्ता वे छाबडि सागरोवमाणि सादिरेयाणि सम्मत्तमणुपालिदं । तदो मिच्छत्तं गदो अंतोमुहतेण पुणो तेण सम्मत्तं लद्धं । पुणो सागरोवमपुधत्तं सम्मत्तमणुपालिदं । तदो दंसणमोहणीयक्खवणाए अन्सुट्ठिदो । तस्स चरिमसमय अधापवत्तकरणस्स मिच्छत्तस्स जहओ पदेससंकमो | भवोमे) संयम और संयमासंयमको बहुत बार प्राप्त किया, चार बार कषायोका उपशमन करके दो वार सातिरेक छयासठ सागरोपमकाल तक सम्यक्त्वका परिपालन किया । तदनन्तर मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ और अन्तर्मुहूर्त से ही पुनः उसने सम्यक्त्वको प्राप्त किया । पुनः सागरोपमपृथक्त्व तक सम्यक्त्वका परिपालन किया । तदनन्तर दर्शनमोहनीयकी क्षपणाके लिए अभ्युद्यत हुआ। वह जीव जव अधःप्रवृत्तकरण के चरम समयमे वर्तमान हो, तब उसके मिथ्यात्वका जघन्य प्रदेशसंक्रमण होता है ॥ ४८ ॥ विशेषार्थ - यहाँ ऊपर जो क्षपितकर्माशिक कहा है, उसका अभिप्राय यह है कि जो जीव पल्यके असंख्यातवे भागसे कम कर्मस्थितिकाल तक सूक्ष्मनिगोदियो में रहकर और अभव्योंके योग्य जघन्य कर्मस्थितिको करके बादर पृथिवीकायिकोंमे उत्पन्न हुआ और अन्त - मुहूर्तमे ही मरण कर पूर्वकोटीकी आयुवाले मनुष्यो में उत्पन्न हुआ । वहाँ आठ वर्षकी अवस्थामे ही संयमको धारण कर और देशोन पूर्वकोटी वर्ष तक संयमको पालन कर, जीवनके अल्प अवशिष्ट रहनेपर मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ । मिथ्यात्व और असंयममे सर्वलघु काल रहकर मरा और दश हजार वर्षकी आयुवाले देवोंमे उत्पन्न हुआ । वहॉ पर्याप्त हो चउरुवसमित्तु मोहं लहुं खवंतो भवे खवियकम्मो । पाएण तर्हि पायं पहुच काओ वि सविसेसं ॥९६॥ कम्मप० प्रदेशसक्र० १ ततो मणिगोदेहिंतो उव्वट्टित्तु बादरपुढविकाइएसु उप्पण्णो अतोमुहुत्तेण काल गतो पुन्यकोडाउगे मणुस्सेसु उववण्णो सव्वलक्खणेहि जोणिजम्मण-णिक्खमणेण अट्ठवासिगो सजम पडिवष्णो । तत्थ देसूण पुव्वकोडी सजम अणुपालित्ता थोवावसेसे जीविये मिच्छत्त गतो सव्वत्थोवाए मिच्छत्तअसजमद्धा मिच्छत्तरेण कालगतो समाणो दसवास सहस्सट्ठिदिएसु देवेसु उववण्णो । तदो अतोमुहुत्तरेण सम्मत्त पडवण्णो दसवास सहस्सा णि जीवित्त, ततो अते मिच्छत्तरेण कालगतो बादरपुढविका इएसु उववण्णो । ततो अतोमुहुत्तरेण उचट्टित्ता मणुस्सेसु उववण्णो । पुणो सम्मत्त वा देसविरतिं वा पडिवजति । एव जत्थ जत्थ सम्मत्त पडिवज्जति तत्थ तत्थ बहुप्पदेसाओ पगडीओ अप्पप्पदेसाओ पगरेति । एयाणिभित्त सम्मत्तादिपडिवज्जाविज्जइ | देव मणुएसु सम्मत्तादि गण्हंतो मुच्चतो य जत्थ तसेसु उववज्जति तत्थ सम्मत्तादी णियमा पडिवज्जति । कयाइ देसविरतिं पडिवज्जति, कयाई सनम पि । कयाइ अणताशुवधी विसजोएति त्ति, कयाइ उवसामगसेटिं पडिवज्जति । 'अट्ठक्खुतो विरतिं सजोयणहा तइयवारे' - एएसु असखेज्जेसु भवग्गहणेसु अठ्ठ्वारे सजम लव्भदि, अट्ठवारे अणताणुवधिणो विसजोएत्ति | 'च उरुवसमित्त मोह' ति एदेसु भवग्गहणेसु चत्तारि वारा चरित्तमोह उवसामेउ 'लहु खवंतो भवे खवियकम्मो' त्ति 'लहु खवतो' - लहुखवगसेटिं पडिवज्जमाणो 'भवे खवियकम्मो' त्ति-एरिसेण विहिणा आगतो खवियकम्मो वुञ्चति । कम्मपयडीचूर्णि, प्रदेशसं०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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