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________________ गा० ५८ ] प्रदेश संक्रम-र -स्वामित्व-निरूपण ४०५ उकस्सओ संक्रुद्धो कोधे तेणेव जाधे माणे कोधो सव्वसंकमेण संछुहदि ताधे तस्स कोधस्स उक्कस्सओ पदेससंकमो' । ४२. एदस्स चेव माणसंजलणस्स उकस्सओ पदेस संकमो कायन्वो णवरि जाधे माणसंजलणो मायासंजलणे संछुभइ ताघे । ४३. एदस्स चेव मायासं जलणस्स उक्कस्सओ पदेससंकमो कायव्वो, णवरि जाधे मायासंजलणो लोभसंजलणे संछु भइ ताधे । ↑ ४४. लोभसं जलणस्स उकस्सओ पदेससंकमो कस्स १४५ गुणिदकम्मंसिओ सव्वलहु खवणाए अन्भुट्टिदो अंतरं से काले काढूण लोहस्स असंकामगो होहिदि ति तस्स लोहस्स उक्कस्सओ पदेससंकमो । ४६. एत्तो जहण्णयं । ४७. पिच्छत्तस्स जहण्णओ पदेससंकमो कस्स १४८. खविदकम्मं सिओ' एह दियकम्मेण जहण्णएण मणुसेसु आगदो सव्बलहु चैव सम्मत्तं उसने ही जिस समय संज्वलनमानमे संज्वलनक्रोधको सर्वसंक्रमण से संक्रमित किया, उस समय उसके संव्वलनक्रोधका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण होता है ॥ ४१ ॥ चूर्णिसू० - इस ही जीवके संज्वलनमानका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण कहना चाहिए | विशेषता केवल यह है कि जिस समय यह संज्वलनमानको संज्वलनमायामे संक्रान्त करता है, उस समय संज्वलनमानका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण होता है । इस ही जीवके संज्वलनमायाके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमणकी प्ररूपणा करना चाहिए । विशेषता केवल यह है कि वह जिस समय संज्वलनमायाको संज्वलनलोभमे संक्रमित करता है, उस समय उसके संज्वलनमायाका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण होता है ॥४२-४३ ॥ शंका-संज्वलनलोभका उत्कृष्टप्रदेशसंक्रमण किसके होता है ? ॥ ४४ ॥ समाधान-गुणितकर्मांशिक जीव सर्वलघुकालसे क्षपणाके लिए अभ्युद्यत हुआ । अन्तरकरण करके तदनन्तर समयमे जब लोभका असंक्रामक होगा, उस समय उसके संज्वलनलोभका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण होता है ॥ ४५॥ चूर्णिम् ० - अब इससे आगे जघन्य प्रदेशसंक्रमणके स्वामित्वको कहते हैं ॥४६॥ शंका- मिध्यात्वका जघन्य प्रदेशसंक्रमण किसके होता है ? ॥ ४७ ॥ समाधान - जो क्षपितकर्माशिक जीव एकेन्द्रिय प्रायोग्य जघन्य सत्कर्मके साथ मनुष्यो में आया और सर्वलघुकालसे ही सम्यक्त्वको प्राप्त हुआ । ( पुनः उसी और विभिन्न १ वरिसवरित्थि पूरिय सम्मत्तमसंखवासियं लहियं । गंता मिच्छत्तमओ जहण्णदेवट्टिई भोच्चा ॥ ८६॥ आगंतु लहु पुरिसं संछुभमाणस्स पुरिसवेयस्स | तस्सेव सगे कोहस्स माणमायाणमवि कसिणो ॥ ८७॥ कम्मप० प्रदेशसक्र० २ पल्ला संखियभागोणकम्मठिइमच्छिओ निगोएसु । सुहुमेसुऽभवियजोग्गं जहण्णयं कट्टु निग्गम्म ॥९४॥ जोगेऽसंखवारे सम्मत्तं लभिय देसविरहं च । अक्खुत्तो विरइं संजोयणहा तइयवारे ॥९५॥
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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