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________________ ४०४ . कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार ३३. एवं छण्णोकसायाणं । ३४. इथिवेदस्स उक्कस्सओ पदेससंकमो कस्स ? ३५. गुणिदकम्मंसिओ असंखेजवस्साउएसु इत्थिवेदं पूरेदूण तदो कमेण पूरिदकम्मसिओ खवणाए अन्भुट्टिदो तदो चरिमट्ठिदिखंडयं चरिमसमयसंछुहमाणयस्स तस्स इस्थिवेदस्स उक्कस्सओ पदेससंकमो'। ३६. पुरिसवेदस्स उक्कस्सओ पदेससंकमो कस्स ? ३७. गुणिदकम्मंसिओ इत्थि-पुरिस-णबुंसयवेदे पूरेदूण तदो सबल खवणाए अन्भुट्टिदो, पुरिसवेदस्स अपच्छिमट्ठिदिखंडयं चरिमसमयसंछुहमाणयस्स तस्स पुरिसवेदस्स उकस्सओ पदेससंकमो । ३८. णबुंसयवेदस्स उक्कस्सओ पदेससंकमो कस्स ? ३९. गुणिदकम्मंसिओ ईसाणादो आगदो सव्वलखवेदुमाहत्तो। तदो गर्बुसयवेदस्स अपच्छिमट्ठिदिखंडयं चरिमसमयसंछुभमाणयस्स तस्स णqसयवेदस्स उकस्सओ पदेससंकमो। ४०. कोहसंजलणस्स उक्कस्सओ पदेससंकमो कस्स १ ४१. जेण पुरिसवेदो चूर्णिसू०-इसी प्रकार हास्यादि छह नोकपायोके उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमणके स्वामित्वको जानना चाहिए ॥३३॥ शंका-स्त्रीवेदका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण किसके होता है ? ॥३४॥ समाधान-कोई गुणितकौशिक जीव असंख्यात वर्षकी आयुवाले भोगभूमियोमे उत्पन्न होकर और वहाँ पर स्त्रीवेदको पूरित करके पुनः क्रमसे पूरित-कर्माशिक होकर क्षपणाके लिए अभ्युद्यत हुआ । तदतन्तर स्त्रीवेदके चरम स्थितिखंडको चरम समयमे संक्रमण करनेवाले उस जीवके स्त्रीवेदका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण होता है ॥३५॥ शंका-पुरुषवेदका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण किसके होता है ? ॥३६॥ समाधान-गुणितकर्माशिक जीव स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेदको पूरित करके तदनन्तर सर्वलघुकालसे क्षपणाके लिए अभ्युद्यत हुआ । वह जिस समय पुरुपवेदके अन्तिम स्थितिखंडको चरम समयमें संक्रमण करता है, उस समय उस जीवके पुरुषवेदका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण होता है ॥३७॥ शंका-नपुंसकवेदका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण किसके होता है ? ॥३८॥ समाधान-कोई गुणितकर्माशिक जीव ईशानस्वर्गसे आया और सर्वलघुकालसे क्षपणाके लिए प्रवृत्त हुआ। तदनन्तर नपुंसकवेदके अन्तिम स्थितिखंडको चरम समयमें संक्रमण करनेवाले उसके नपुंसकवेदका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण होता है ॥३९॥ शंका-संज्वलन क्रोधका उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रमण किसके होता है ? ॥४०॥ समाधान-जिसने पुरुपवेदके उत्कृष्ट द्रव्यको संज्वलन क्रोधमे संक्रान्त किया, १ इत्थीए भोगभूमिसु जीविय वासाणसंखियाणि तओ। हस्सठिइं देवत्ता सव्वलहुं सब्यसंछोमे ॥८५॥ , २ ईसाणागयपुरिसस्स इत्थियाए व अट्ठवासाए । मासपुहुत्तम्भहिए नपुसगे सबसंकमणे ॥८॥ कम्मप०, प्रदेशासक,
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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