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________________ गा० ५८] प्रदेशसंक्रम-स्वामित्व-निरूपण ४०९ पदेससंकमो । ५९. एवं माण-मायासंजलण-पुरिसवेदाण' । ६०. लोहसंजलणस्स जहण्णओ पदेससंकमो कस्स ? ६१. एइंदियकम्मेण जहण्णएण तसेसु आगदो संजमासंजमं संजमं च बहुसो लद्धण कसाएसु किं पि णो उवसामेदि । दीहं संजमद्धमणुपालिदूण खवणाए अन्भुट्टिदो तस्स अपुवकरणस्स आवलियपविट्ठस्स लोहसंजलणस्स जहण्णओ पदेससंकमो । ६२. णबुंसयवेदस्स जहण्णओ पदेससंकमो कस्स ? ६३. एई दियकम्मेण जहण्णएण तसेसु आगदो तिपलिदोवमिएसु उववण्णो । तिपलिदोवमे अंतोमुहुत्ते सेसे सम्मत्तमुप्पाइदं । तदो पाए सम्मत्तेण अपडिवदिदेण सागरोवमछावट्ठिमणुपालिदेण संजमासंजमं संजमं च बहुसो लद्धो, चत्तारि वारे कसाया उवसामिदा। तदो सम्मामिच्छत्तं गंतूण पुणो अंतोमुहुत्तेण सम्मत्तं घेत्तुण सागरोवमछावट्ठिमणुपालिदूण मणुसभवग्गहणे सव्वचिरं संजममणुपालिदूण खवणाए उवहिदो। तस्स अधापवत्तकरणस्स चरिमसमए चूर्णिसू०-इसी प्रकारसे संज्वलनमान, संज्वलनमाया और पुरुपवेदके जघन्यप्रदेशसंक्रमणका स्वामित्व जानना चाहिए ॥५९।।। शंका-संज्वलनलोभका जघन्य प्रदेशसंक्रमण किसके होता है ? ॥६०॥ समाधान-जो जीव एकेन्द्रियोके योग्य जघन्य सत्कर्मके साथ सोमे आया । वहॉपर संयमासंयम और संयमको बहुत वार प्राप्त करके कपायोमे कुछ भी उपशमन नहीं करता है, तथा वह दीर्घ काल तक संयमका परिपालन करके चारित्रमोहनीयकी क्षपणाके लिए अभ्युद्यत हुआ । ऐसे आवली-प्रविष्ट अपूर्वकरण-संयतके संज्वलनलोभका जघन्य प्रदेशसंक्रमण होता है ॥६१॥ शंका-नपुंसकवेदका जघन्य प्रदेशसंक्रमण किसके होता है ? ॥६२॥ समाधान-जो जीव एकेन्द्रियोके योग्य जघन्य सत्कर्मके साथ त्रसोमें आया और क्रमसे तीन पल्योपमवाले भोगभूमियोमे उत्पन्न हुआ । तीन पल्योपममे अन्तर्मुहूर्त शेप रहनेपर उसने सम्यक्त्वको उत्पन्न किया । तदनन्तर अप्रतिपतित सम्यक्त्वके साथ छयासठ सागरोपम कालतक सम्यक्त्वका परिपालन करते हुए संयमासंयम और संयमको बहुत वार प्राप्त हुआ। चार वार कषायोका उपशमन किया । तत्पश्चात् सम्यग्मिथ्यात्वको प्राप्त होकर और पुनः अन्तर्मुहूर्तसे ही सम्यक्त्वको ग्रहण कर दूसरी वार छयासठ सागरोपम कालतक सम्यक्त्वका परिपालन कर अन्तिम मनुष्य भवके ग्रहण करनेपर सर्व-चिरकाल तक संयमका परिपालन करके जीवनके अल्प अवशेष रहनेपर क्षपणाके लिए उपस्थित हुआ। ऐसे जीवके अधःप्रवृत्तकरणके चरम समयमे नपुंसकवेदका जघन्य प्रदेशसंक्रमण होता है ॥६३॥ १ पुरिसे संजलणतिगे य घोलमाणेण चरमवद्धस्स । सग-अंतिमे असाएण समा अरई य सोगो य ॥१०३॥ कम्मप० प्रदेशसक्र० ५२
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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