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________________ ४०० कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार १२. उव्वेलणसंकमे पदेसग्गं थोवं' । १३. विज्झादसंकमे पदेसग्गमसंखेज्जगुणं । १४. अधापवत्तसंकये पदेसग्गमसंखेज्जगुण । १५. गुणसंकमे पदेसग्गमसंखेज्जगुण । १६. सव्वसंकमे पदेसग्गमसंखेज्जगुण । उनका उन गुणस्थानोमे भवप्रत्ययसे अबन्ध कहलाता है। जैसे मिथ्यात्वगुणस्थानमे एकेन्द्रिय जाति, स्थावर, सूक्ष्म, साधारण आदि प्रकृतियोंका वन्ध सामान्यतः होता है, परन्तु नारकियोके नारकभवके कारण उनका बन्ध नहीं होता है, क्योकि वे मरकर एकेन्द्रियादिमे उत्पन्न ही नहीं होते । यतः नारक-भवमे एकेन्द्रियादि प्रकृतियोका वन्ध नहीं है, अतः वहाँ पर जो उनके प्रदेशोका संक्रमण पर-प्रकृतिमे होता रहता है, उसे भी विध्यातसंक्रमण कहते है। यह संक्रमण अधःप्रवृत्तसंक्रमणके निरुद्ध हो जाने पर ही होता है । सभी संसारी जीवोके ध्रुवबंधिनी प्रकृतियोके बन्ध होनेपर, तथा स्व-स्वभव-वन्धयोग्य परावर्तमान प्रकृतियोके बन्ध या अवन्धकी दशामे जो स्वभावतः प्रकृतियोके प्रदेशोका पर-प्रकृतिरूप संक्रमण होता रहता है, उसे अधःप्रवृत्तसंक्रमण कहते है। जैसे जिस गुणस्थानमें चारित्रमोहनीयकी जितनी प्रकृतियोंका बन्ध होता है, उन वध्यमान प्रकृतियोमे चारित्रमोहनीयकी जितनी सत्त्व प्रकृतियाँ हैं, उनके प्रदेशोंका जो प्रदेशसंक्रमण होता है, वह अधःप्रवृत्तसंक्रमण है। अपूर्वकरणादि परिणामविशेपोका निमित्त पाकर प्रतिसमय जो असं. ख्यातगुणश्रेणीरूपसे प्रदेशोका संक्रमण होता है, उसे गुणसंक्रमण कहते है । यह गुणसंक्रमण अपूर्वकरणके प्रथम समयसे लेकर दर्शनमोहनीयके क्षपणकालमें, चारित्रमोहनीयके क्षपणकालमे, उपशमश्रेणीमे, अनन्तानुबन्धीकी विसंयोजनामे, सम्यक्त्वकी उत्पत्ति-कालमे, तथा सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वकी उद्वेलनाके चरमस्थितिखंडके प्रदेशसंक्रमणके समय होता है । विवक्षित प्रकृतिके सभी कर्मप्रदेशोका जो एक साथ पर-प्रकृतिमे संक्रमण होता है, उसे सर्वसंक्रमण कहते है। यह सर्वसंक्रमण उद्वेलन, विसंयोजन और क्षपणकालमे चरमस्थितिखंडके चरमसमयवर्ती प्रदेशोका ही होता है, अन्यका नहीं, ऐसा जानना चाहिए । अव उपर्युक्त संक्रमणोके प्रदेशगत अल्पबहुत्वको कहते हैं चूर्णिसू०-उद्वेलनसंक्रमणमे प्रदेशाग्र सबसे कम होते है। उद्वेलनसंक्रमणसे विध्यातसंक्रमणमे प्रदेशाग्र असंख्यातगुणित होते हैं। विध्यातसंक्रमणसे अधःप्रवृत्तसंक्रमणमे प्रदेशाग्र असंख्यातगुणित होते है। अधःप्रवृत्तसंक्रमणसे गुणसंक्रमणमे प्रदेशाग्र असंख्यातगुणित होते है । गुणसंक्रमणसे सर्वसंक्रमणमे प्रदेशाग्र असंख्यातगुणित होते है ॥१२-१६॥ १ कुदो अगुलासखेजभागपडिभागियत्तादो । जयध २ कुदो, दोण्हमेदेसिमगुलासखेजभागपडिभागियत्ते समाणे वि पुन्विल्लभागहारादो विज्झादभागहारस्सासखेजगुणहीणत्तभुवगमादो । जयध० ३ किं कारण १ पलिदोवमासखेजभागपडिभागियत्तादो । जयध० ४ किं कारण ! पुचिल्लभागहारादो एदत्स असोजगुणहीणभागहारपडिबद्धत्तादो । जयध० ५ किं कारण ? एगरूवभागहारपडिबद्धत्तादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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