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________________ गा० ५८] प्रदेशसंक्रम-अर्थपद-निरूपण नरूपण ३९९ पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण स्थितिखंडको एक अन्तर्मुहूर्त के द्वारा उत्कीर्ण करता है । अर्थात् उद्वेलन करता है । उकेरने या उकेलनेका नाम उत्कीर्ण या उद्वेलन है । पुनः द्वितीय अन्तर्मुहूर्तके द्वारा पल्योपमके असंख्यातवे भागप्रमाण स्थितिखंडको उत्कीर्ण करता है । इसी प्रकार तृतीय, चतुर्थादि अन्तर्मुहूर्तोंके द्वारा तावत्प्रमाण स्थितिखंडोको उत्कीर्ण करता जाता है। यह क्रम पल्योपमके असंख्यातवे भागकाल तक जारी रहता है। इतने कालमे वह उक्त दोनो प्रकृतियोकी उद्वेलना कर डालता है, अर्थात् उन्हे निःशेष कर देता है। ये एक-एक अन्तर्मुहूर्तमे होनेवाले उत्तरोत्तर स्थितिखंड यद्यपि सभी पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण है, तथापि उत्तरोत्तर विशेष हीन है। यह स्थितिसंक्रमणकी अपेक्षा वर्णन है। प्रदेशसंक्रमणकी अपेक्षा तो पूर्व-पूर्व स्थितिखंडसे उत्तरोत्तर स्थितिखंडोके कर्मप्रदेश विशेष-विशेप अधिक हैं। प्रदेशोके उत्कीरणकी विधि यह है कि प्रथम समयमें अल्पप्रदेशोका उत्कीरण करता है। द्वितीय समयमें उससे असंख्यातगुणित प्रदेशोका, तृतीय समयमे उससे भी असंख्यातगुणित प्रदेशोका उत्कीरण करता है। इस प्रकार यह क्रम प्रत्येक अन्तर्मुहूर्तके अन्तिम समय तक रहता है। प्रदेशोको उत्कीर्ण ( उकेर ) कर जहाँ निक्षेप करता है, उसका भी एक विशिष्ट क्रम है और वह यह कि कुछको तो स्वस्थानमे ही नीचे निक्षिप्त करता है और कुछको परस्थानमें निक्षिप्त करता है । इसका स्पष्टीकरण यह है कि प्रथम स्थितिखंडमेसे प्रथम समयमे जितने प्रदेश उकेरता है, उनमेसे परस्थानमे अर्थात् परप्रकृतिमें तो अल्प प्रदेश निक्षेपण करता है । किन्तु स्वस्थानमे उनसे असंख्यातगुणित प्रदेशोका अधःनिक्षेपण करता है। इससे द्वितीय समयमें स्वस्थानमे तो असंख्यातगुणित प्रदेशोंका निक्षेपण करता है, किन्तु परस्थानमे प्रथम समयके परस्थान-प्रक्षेपसे विशेष हीन प्रदेशोका प्रक्षेपण करता है। यह क्रम प्रत्येक अन्तर्मुहूर्तके अन्तिम समय तक जारी रहता है। यह उद्वेलनसंक्रमणका क्रम उक्त दोनो प्रकृतियोके उपान्त्य स्थितिखंड तक चलता है। अन्तिम स्थितिखंडमें गुणसंक्रमण और सर्वसंक्रमण दोनो होते हैं। इस प्रकार यह उद्वेलनासंक्रमणका स्वरूप कहा। अब विध्यातसंक्रमणका स्वरूप कहते हैं-जिन कर्मोंका गुणप्रत्यय या भवप्रत्ययसे जहाँ पर बन्ध नहीं होता, वहाँ पर उन कर्मोंका जो प्रदेशसंक्रमण होता है, उसे विध्यातसंक्रमण कहते हैं। गुणस्थानोके निमित्तसे होनेवाले बन्धको गुणप्रत्यय बन्ध कहते है। जैसे मिथ्यात्व आदि सोलह प्रकृतियोका मिथ्यात्वके निमित्तसे वन्ध होता है, आगे नहीं होता। अनन्तानुबन्धी आदि पञ्चीस प्रकृतियोका दूसरे गुणस्थान तक वन्ध होता है, आगे नहीं होता। इस प्रकार आगेके गुणस्थानोमें भी जानना। इन बन्ध-व्युच्छिन्न प्रकृतियोका उपरितन गुणस्थानोमे बन्ध नहीं होता है, अतएव वहाँ पर उक्त प्रकृतियोका जो प्रदेशसत्त्व है, उसका जो पर-प्रकृतियोमे संक्रमण होता है, उसे आगममें विध्यातसंक्रमण कहा है। जिन प्रकृतियोका मिथ्यात्व आदि गुणस्थानोमे वन्ध संभव है, फिर भी जो भवप्रत्ययसे अर्थात् नारक, देवादि पर्यायविशेपके निमित्तसे वहॉपर नहीं बंधती हैं,
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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