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________________ ३९४ कलाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार हीणबंधट्ठाणस्सुवरिल्ले अंतरे असंखेज्जलोगमेत्ताणि घादट्ठाणाणि । ५३३. एवमणंतगुणहीणबंधट्ठाणस्सुवरिल्ले अंतरे असंखेज्जलोगमेत्ताणि घादट्ठाणाणि । ५३४. एवमणंतगुणहीणवंधट्ठाणस्स उवरिल्ले अंतरे असंखेज्जलोगमेत्ताणि धादट्ठाणाणि भवंति, णत्थि अण्णमि । ५३५. एवं जाणि बंधट्ठाणाणि ताणि णियमा संकमट्ठाणाणि । ५३६. जाणि संकमट्ठाणाणि ताणि बंधट्टाणाणि वा ण वा । ५३७. तदो बंधट्ठाणाणि थोवाणि । ५३८. संतकम्मट्ठाणाणि असंखेज्जगुणाणि । ५३९. जाणि च संतकम्मढाणाणि तणि संकमट्ठाणाणि । ५४०. अप्पाबहुअं जहा सम्माइडिगे बंधे तहा।। प्राप्त होता है। इस द्वितीय अनन्तगुणहीन वन्धस्थानके उपरिम अन्तरालमे फिर भी असंख्यात लोकप्रमाण घातस्थान होते है ।।५२९-५३२॥ चूर्णिसू०-इस प्रकार ( तृतीय, चतुर्थादि ) अनन्तगुणहीन वन्धस्थानोके उपरिम अन्तरालोमे सर्वत्र असंख्यातलोकप्रमाण घातस्थान होते है, अन्यमे नही । अर्थात् असंख्यातगुणहीनादि अन्य वन्धस्थानोके उपरिम अन्तरालमे घातस्थान नहीं होते हैं। इस प्रकार जितने बन्धस्थान है, वे नियमसे संक्रमस्थान है। किन्तु जो संक्रमस्थान हैं, वे बन्धस्थान हैं भी, और नहीं भी है। इसलिए वन्धस्थान थोड़े हैं और सत्कर्मस्थान असंख्यातगुणित है । अनुभागके जितने सत्कर्मस्थान होते है, उतने ही संक्रमस्थान होते है ॥५३३-५३९।। अब चूर्णिकार संक्रमस्थानोका अल्पवहुत्व कहने के लिए समर्पणसूत्र कहते हैं चूर्णिसू०-जिस प्रकारसे सम्यग्दृष्टिक वन्धस्थानोका अल्पवहुत्व कहा है, उसी प्रकारसे यहॉपर संक्रमस्थानोका अल्पवहुत्व जानना चाहिए ॥५४०॥ विशेपार्थ-चूर्णिकारने संक्रमस्थानोके जिस अल्पबहुत्वका यहाँ पर संकेत किया है, वह स्वस्थान और परस्थानके भेदसे दो प्रकारका है। उसमे स्वस्थान-अल्पवहुत्व इस प्रकार है-मिथ्यात्वके बन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान सबसे कम है। हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित है। हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित है । इसी प्रकार सर्व कर्माके संक्रमस्थानोका अल्पबहुत्व जानना चाहिए। केवल सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वके १ कुदो; एगछठाणेणूणाणुभागसतकम्मियमादि कादूण जाव पच्छाणुपुटवीए विदियअट्ठकाणे त्ति ताव एदेसु ठाणेसु घादिजमाणेसु पयदतरे असखेड्जलोगमेत्तघादट्ठाणाणमुप्पत्तीए परिप्फुडमुवलंभादो । जयघ २ णवरि सुहुमहदसमुप्पत्तियजहण्णाणादो उवरिमाणं सखेजाणमट्ठकुव्वकाणमतरेसु हदसमुप्पत्तियसकमट्ठाणाणमुप्पत्ती णस्थि त्ति वत्तव्यं । जयध० ३ किं कारण ? पुव्वुत्तणाएण सव्वेसिं बधट्ठाणाणं सकमठाणत्तसिद्धीए विरोहाभावादो । जयध° ४ कुदो, बंधाणेहिंतो पुधभूदघाट्ठाणेसु वि सकमठाणाणमणुवत्तिदसणादो । जयध° ५ जदो एव घादट्ठाणेसु बंधाणाण सभवो णस्थि, तदो ताणि थोवाणि त्ति भणिद होइ । जयध° ६ कुदो, बधठाणेहिंतो असंखेज्जगुणघादट्ठाणेसु वि संतकम्मट्ठाणाणं सभवदसणादो । जयघ°
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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