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________________ पण ३९३ गा० ५८ ] अनुभागसंक्रम-स्थान-प्रमाण-निरूपण एगं संतकम्मं तमेगं संकमट्ठाणं । ५२७. दुचरिमे अणुभागबंधट्ठाणे एवमेव । ५२८. एवं ताव जाव पच्छाणुपुवीए पडममणंतगुणहीणबंधट्ठाणमपत्तो तिं । ५२९. पुव्वाणुपुवीए गणिज्जमाणे जं चरिममणंतगुणं बंधट्ठाणं तस्स हेट्ठा अणंतरमणंतगुणहीणमेदम्मि अंतरे असंखेज्जलोगमेत्ताणि घादट्ठाणाणि । ५३०. ताणि संतकम्मट्ठाणाणि ताणि चेव संकमट्ठाणाणि । ५३१. तदो पुणो बंधट्टाणाणि संकमट्ठाणाणि च ताव तुल्लाणि जाव पच्छाणुपुवीए विदियमणंतगुणहीणवंधट्ठाणं । ५३२. विदियअणंतगुणसंक्रमस्थान तीन प्रकारके होते है:-वन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान, हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान, और हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान । सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वके बन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान नहीं होते है, शेप दो संक्रमस्थान होते है । सुगम होनेसे चूर्णिकारने समुत्कीतना नही कही है। आगे शेप तीन अनुयोगद्वारोको कहा है। अब चूर्णिकार प्ररूपणा और प्रमाण इन दोनोको एक साथ कहते है चूर्णिसू०-उत्कृष्ट अनुभागवन्धस्थान पर जो एक अनुभागसत्कर्म है, वह एक अनुभागसंक्रमस्थान है। द्विचरम अनुभागवन्धस्थानपर इसी प्रकार एक अनुभागसत्कर्मस्थान और एक अनुभागसंक्रमस्थान होता है। इस प्रकार त्रिचरम, चतुश्चरम आदिके क्रमसे पश्चादानुपूर्वीके द्वारा अनन्तगुणहीन प्रथम बन्धस्थान प्राप्त होने तक अनुभागसत्कर्मस्थान और अनुभागसंक्रमस्थान उत्पन्न होते हुए चले जाते है, ।१५२६-५२८।। चूर्णिसू०-पूर्वानुपूर्वीसे गिननेपर जो अन्तिम अनन्तगुणित अनुभागवन्धस्थान है, उसके नीचे अनन्तगुणितहीन बन्धस्थानके नही प्राप्त होने तक इस मध्यवर्ती अन्तरालमे असंख्यातलोकप्रमाण घातस्थान होते है। ये घातस्थान ही अनुभागसत्कर्मस्थान कहलाते हैं और वे ही अनुभागसंक्रमस्थानरूपसे परिणत होनेके कारण अनुभागसंक्रमस्थान कहलाते है। उस पूर्वोक्त अनन्तगुणहीन बन्धस्थानसे लेकर पुनः बन्धस्थान और संक्रमस्थान ये दोनो तब तक तुल्य चले जाते हैं, जब तक कि पश्चादानुपूर्वीसे द्वितीय अनन्तगुणहीन बन्धस्थान १ वधाणतरसमए बचट्ठाणस्सेव सतकम्मववएससिद्धीदो । तमेव संकमठाण पि, बधावलियवदिक्कमाणतर तस्सेव सकमठाणभावेण परिणयत्तादो । तदो पजवसाणव धट्ठाणस्स सतकम्मछाणत्ताणुवादमुहेण सकमठाणभावविहाणमेदेण सुत्तेण कय ति दट्ठन्य । जयध० २ कुदो, तेसिं सव्वेसि वधसमुप्पत्तियसतकम्मट्ठाणत्तसिद्धीए पडिसेहाभावादो । ३ त जहा-पुव्वाणुपुवी णाम सुहुमहदसमुप्पत्तियसवजहण्णसतकम्मलाणप्पहुडि छवड्ढीए अवट्ठिदाणमणुभागबधट्ठाणाणमादीदो परिवाडीए गणणा । ताए गणिजमाणे ज चरिममणतगुणवधट्ठाण पज्जवसाणट्ठाणादो हेट्ठा रूवूणछट्ठाणमेत्तमोसरिदूणावठ्ठिद, तस्स हेटछा अणंतरमणतगुणहीणवधट्ठाणमपावेदूण एदम्मि अतरे घादठाणाणि समुप्पज्जति | केत्तियमेत्ताणि ताणि त्ति वुत्ते असखेज्जलोगमेत्ताणि त्ति तेसिं पमाणणिद्देसो कदो । जयध० ४ ताणि समणतरणिद्दिठ्यादाणाणि सतकम्मट्ठाणाणि, हदसमुप्पत्तियसतकम्मभावेणावट्ठिदाण तभावाविरोहादो । ताणि चेव सकमठाणाणि, कुदो, तेसिमुप्पत्तिसमणतरसमयप्पहुडि ओकड्डुणादिवसेण सकमपञ्जायपरिणाम पडिसेहाभावादो । जयध० ५०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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