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________________ गा० ५८] अनुभागसंक्रमस्थान-अल्पवहुत्व-निरूपण ३९५ घातस्थान सवसे कम होते है और संक्रमस्थान विशेप अधिक होते है। अब परस्थानअल्पबहुत्व कहते हैं-सम्यग्मिथ्यात्वके अनुभागसंक्रमस्थान सवसे कम हैं। सम्यग्मिथ्यात्वसे सम्यक्त्वप्रकृति के अनुभागसत्कर्मस्थान असंख्यातगुणित हैं। सम्यक्त्वप्रकृतिसे हास्यके बन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित है। हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित हैं। हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित है। हास्यके हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थानोसे रतिके बन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित है। हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित है । हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित हैं। रतिके हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थानोसे स्त्रीवेदके बन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित है। हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित है। हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित हैं । स्त्रीवेदके हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थानोसे जुगुप्साके बन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित है । हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित है। हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित हैं। जुगुप्साके हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थानोसे भयके बन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित है। हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित है। हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित हैं। भयके हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थानोसे शोकप्रकृतिके तीनो प्रकारके संक्रमस्थान उत्तरोत्तर असंख्यातगुणित है। शोकप्रकृतिसे अरतिके तीनों संक्रमस्थान उत्तरोत्तर असंख्यातगुणित है। अरतिसे नपुंसकवेदके तीनो संक्रमस्थान उत्तरोत्तर असंख्यातगुणित हैं। नपुंसकवेदसे अप्रत्याख्यानमानके वन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित हैं । क्रोधके विशेष अधिक है । मायाके विशेष अधिक है । लोभके विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यानलोभके बन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थानोसे अप्रत्याख्यान मानके हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित है। इससे क्रोध, माया और लोभके उत्तरोत्तर असंख्यातगुणित है। अप्रत्याख्यानलोभके हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थानोसे अप्रत्याख्यानमानके हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित हैं। इनसे क्रोध, माया और लोभके उत्तरोत्तर असंख्यातगुणित है। अप्रत्याख्यानलोभके हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थानोसे प्रत्याख्यानमानके बन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित हैं । क्रोधके विशेष अधिक हैं । मायाके विशेष अधिक है। लोभके विशेष अधिक हैं। प्रत्याख्यानलोभके बन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थानोसे प्रत्याख्यानमानके हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित है। इनसे प्रत्याख्यान क्रोध, माया और लोभके उत्तरोत्तर विशेष-विशेष अधिक हैं। प्रत्याख्यानलोभके हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थानोसे प्रत्याख्यानमानके हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित हैं। इनसे क्रोध, माया और लोभके उत्तरोत्तर विशेप-विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानलोभके हतहतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थानोसे संज्वलनमानके वन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित हैं। इनसे क्रोध, माया और लोभके विशेष-विशेप अधिक है। संज्वलनलोभके वन्धसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थानोसे संज्वलनमानके हतसमुत्पत्तिकसंक्रमस्थान असंख्यातगुणित है।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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