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________________ ३८६ कसाय पाहुड सुत्त [ ५ संक्रम-अर्थाधिकार विसंजोए दूण पुणो मिच्छत्तं गंतूण अंतो मुहुत्त संजुत्ते वि तस्स सुहुमस्स हेट्ठदो संतकम्पं । ४४६. तदो जो अंतोमुहुत्तसंजुत्तो जाव सुहुमकम्मं जहण्णयं ण पावदि ताव घादं करेज्ज । ४४७ तदो सव्वत्थोवाणुभागे वादिज्जमाणे घादिदे तस्स जहणिया हाणी । ४४८. तस्सेव से काले जहण्णयमवड्डाणं । ४४९. कोहसंजलणस्स जहणिया बडी मिच्छत्तभंगो । ४५०. जहणिया हाणी कस्स १ ४५१. खवयस्स चरिमसमयबंध चरिमसमय संकामयत । ४५२. जहण्णयमवाणं कस्स १ ४५३. तस्सेव चरिमे अणुभागखंडए वमाणयस्स । ४५४. समाधान - अनन्तानुवन्धी कपायोका विसंयोजन करके पुनः मिथ्यात्वको जाकर और अन्तर्मुहूर्त तक अनन्तानुवन्धी कपायोका संयोजन करके भी जिसके सूक्ष्म निगोदियाके अनुभागसे नीचे अनुभागसत्त्व रहता है, तदनन्तर वह अन्तर्मुहूर्त तक कपायोंसे संयुक्त हो करके भी जब तक सूक्ष्मनिगोदिया के योग्य जघन्य कर्मको नहीं प्राप्त कर लेता है, तव तक घात करता जाता है । इस क्रमसे घात करते हुए घातने योग्य सर्व स्तोक अनुभागके घात करनेपर उस जीवके अनन्तानुबन्धी कपायोके अनुभागकी जघन्य हानि होती है । उस ही जीवके तदनन्तरकालमे उक्त कषायोके अनुभागका जघन्य अवस्थान होता है ॥४४५-४४८॥ चूर्णिसू० – संज्वलनक्रोध की जघन्य वृद्धिका स्वामित्व मिथ्यात्व के समान जानना चाहिए ॥ ४४९ ॥ शंका- संन्वलनक्रोधकी जघन्य हानि किसके होती है ? ॥ ४५० ॥ समाधान- चरमसमयमे अर्थात् क्रोधकी तृतीय संग्रहकृष्टि के अन्तिम समय में वॅधे हुए नवकवद्ध अनुभागको चरम समयमे संक्रमण करनेवाले अर्थात् मानवेदककालके दो समय कम दो आवलियोके अन्तिम समय में वर्तमान क्षपकके संज्वलनक्रोध के अनुभागकी जघन्य हानि होती है ॥ ४५१ ॥ शंका-संज्वलनक्रोध के अनुभागका जघन्य अवस्थान किसके होता है ? ॥ ४५२ ॥ समाधान- अन्तिम अनुभाग कांडकमे वर्तमान उस ही क्षपकके संज्वलन क्रोधके वुड्ढसगहणठो । XXX एव वृत्तविहाणेण विदियसमए वड्ढिदूण तत्तो आवलियादीदस्स तस्स जहणिया वड्ढी; अणइच्छाविदवं धावलियस्स णवकबंधस्स सकमपाओग्गभावाणुववत्तीदो | जयध० १ एत्थ चरिमसमयवधो त्ति वुत्ते कोहतदियसगह किट्टी वेदयचरिमसमयबद्धणवकबधाणुभाग घेत्त । तस्स चरिमसमयसकामओ णाम माणवेदगद्धाए दुसमऊणदोआवलियचरिमसमए वट्टमाणो ति गहेयव्व । तस्स को धस जलणाणुभाग सकमणिव घणा जहणिया हाणी होइ । जयध० २ चरिमाणुभागखंडय णाम किट्टीकारयचरिमावस्थाए घेत्तव्य, उवरिमणुसमयोवट्टणाविसए खडय घादासंभवादो । जयध० * ताम्रपत्रवाली प्रतिमे 'संतकम्म' पदसे आगे 'पयदजहण्णसामित्तसाहणट्टमिदं ताव पुव्वमेव णिमिदं' इतना अंग और भी सूत्ररूपसे मुद्रित है (देखो पृ० ११७६ ) । पर यह सूत्रका अग नहीं, अपि तु स्पष्ट रूपसे टीकाका अश है ।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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