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गा० ५८] अनुभागसंक्रम-पदनिक्षेप-स्वामित्व-निरूपण
३८५ ४३६. दसणमोहणीयक्खवयस्स समयाहियावलियअक्खीणदंसणमोहणीयस्स तस्स जहणिया हाणी । ४३७. जहण्णयमवट्ठाणं कस्स ? ४३८. तस्स चेव दुचरिमे अणुभागखंडए हदे चरिमअणुभागखंडए वट्टमाणखवयस्स। ४३९. सम्मामिच्छत्तस्स जहणिया हाणी कस्स ? ४४०. दंसणमोहणीयक्खवयस्स दुचरिमे अणुभागखंडए हदे तस्स जहणिया हाणी । ४४१. तस्स चेव से काले जहण्णयमवहाणं ।
४४२. अणंताणुबंधीणं जहणिया वड्डी कस्स ? ४४३. विसंजोएदूण पुणो मिच्छत्तं गंतूण तप्पाओग्गविसुद्धपरिणामेण विदियसमए तप्पाओग्गजहण्णाणुभागंबंधिऊण आवलियादीदस्स तस्स जहणिया वड्नी । ४४४. जहणिया हाणी कस्स ? ४४५.
समाधान-दर्शनमोहनीयका क्षपण करनेवाले जीवके एक समय अधिक आवलीकाल जब दर्शनमोहनीयके क्षपण करनेमे शेष रहे, तब उसके सम्यक्त्वप्रकृतिके अनुभागकी जघन्य हानि होती है ॥४३६॥
शंका-सम्यक्त्वप्रकृतिके अनुभागका जघन्य अवस्थान किसके होता है ? ॥४३७॥
समाधान-द्विचरम अनुभाग-कांडकका घात करके चरम अनुभाग-कांडकके घात करनेमे वर्तमान उस ही दर्शनमोहनीयका क्षपण करनेवाले जीवके सम्यक्त्वप्रकृतिके अनुभागका जघन्य अवस्थान होता है ॥४३८॥
शंका-सम्यग्मिथ्यात्वके अनुभागकी जघन्य हानि किसके होती है ? ४ ३९॥
समाधान-सम्यग्मिथ्यात्वके द्विचरम अनुभागकांडकके घात कर देनेपर उसी दर्शनमोहनीय-क्षपकके सम्यग्मिथ्यात्वके अनुभागकी जघन्य हानि होती है । उस ही जीवके तदनन्तर समयमें सम्यग्मिथ्यात्वके अनुभागका जघन्य अवस्थान होता है ॥४४०-४४१॥ को शंका-अनन्तानुबन्धी कपायोके अनुभागकी जघन्य वृद्धि किसके होती है? ॥४४२॥
समाधान-जो जीव अनन्तानुबन्धी कषायोका विसंयोजन करके पुनः मिथ्यात्वको जाकर और तत्प्रायोग्य विशुद्ध परिणामसे द्वितीय समयमे तत्प्रायोग्य जघन्य अनुभागको बाँधकर आवलीकाल व्यतीत करता है, उसके अनन्तानुवन्धी कषायांके अनुभागकी जघन्य वृद्धि होती है ॥४४३॥
शंका-अनन्तानुबन्धी कपायोके अनुभागकी जघन्य हानि किसके होती है ? ॥४४४॥
१ कुदो, तत्थाणुसमयोववृणावसेण सुह, थोवीभूदाणुभागसतकम्मादो तक्काले थोवयराणुभागसकमहाणिदसणादो । जयध०
२ तस्स चेव दसणमोहक्खवयस्स दुचरिमाणुभागखडय घादिय तदणतरसमये तप्पाओग्गजहण्णहाणीए परिणदस्स चरिमाणुभागखडयविदियसमयप्पहुडि जावतोमुहुत्त जहण्णावठाणसकमो होइ, तत्थ पयारतरा
३ कुदो, दुचरिमाणुभागखडयसकमादो अणतगुणहाणीए हाइदूण चरिमाणुभागखडयसरूवेण परिणदस्स पढमसमए जहण्णभावसिद्धिपवाहाणुवलभादो । जयव०
४ एत्थ तप्पाओग्गविसुद्धपरिणामेणेत्ति णिद्दे सो पढमसमयजहण्णाणुभागवधादो विदियसमए जहण्ण
सभवादो। जयध०
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