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________________ गा०५८ ] अनुभाग संक्रम-पदनिक्षेप स्वामित्व-निरूपण ३८७ एवं माण- मायासंजल - पुरिसवेदाणं । ४५५. लोहसंजलणस्स जहणिया बड़ी मिच्छत्तभंगो । ४५६. जहणिया हाणी कस्स ? ४५७. खवयस्स समयाहिपावलियस कसायस्स । ४५८. जहण्णयमवट्ठाणं कस्स १४५९. दुचरिमे अणुभागखंडए हदे चरिमे अणुभागखंडए वट्टमाणस्स । ४६०, इस्थिवेदस्स जहण्णिया चड्डी मिच्छत्तभंगो । ४६१. जहणिया हाणी कस्स १४६२. चरिमे अणुभागखंडए पढमसमयसंकामिदे तस्स जहण्णिया हाणी | ४६३. तस्सेव विदियसमये जहण्णयमवद्वाणं" । ४६४. एवं णस्यवेद छष्णोकसायाणं । अनुभागका जघन्य अवस्थान होता है ||४५३॥ 0 चूर्णिसू० - इसी प्रकार संज्वलन मान, मायाकपाय और पुरुषवेदके अनुभागकी जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थान जानना चाहिए । संज्वलन लोभकी जघन्य वृद्धिका स्वामित्व मिथ्यात्व के समान है ||४५४-४५५॥ शंका-संज्वलनलोभकी जघन्य हानि किससे होती है ? ॥ ४५६ ॥ समाधान - एक समय अधिक आवलीकालवाले सकपाय सूक्ष्मसाम्पराय क्षपकके होती है ॥४५७॥ शंका-संज्वलनलोभका जघन्य अवस्थान किसके होता है ? ॥ ४५८ ॥ समाधान - द्विचरम अनुभागकांडकको घात कर चरम अनुभागकांडकमे वर्तमान क्षपक होता है || ४५९॥ चूर्णिसू० - स्त्रीवेदकी जघन्य वृद्धि मिध्यात्वके समान जानना चाहिए || ४६०॥ शंका- स्त्रीवेदकी जघन्य हानि किसके होती है ? ॥ ४६१ ॥ समाधान - स्त्रीवेदके अन्तिम अनुभागकांडकको प्रथम समयमे संक्रान्त करनेपर, अर्थात् अन्तिम अनुभागकांडकके प्रथम समयमे वर्तमान क्षपकके स्त्रीवेदकी जघन्य हानि होती है ॥४६२॥ चूर्णि सू०. ० - उस ही जीवके द्वितीय समयमे खीवेदका जघन्य अवस्थान होता है । इसी प्रकार नपुंसकवेद और हास्यादि छह नोकषायोकी वृद्धि, हानि और अवस्थानके स्वामित्वको जानना चाहिए ॥४६३-४६४॥ १ कुदो, वड्ढी मिच्छत्तभगेण, हाणि अवट्ठाणाण पि खत्रयस्स चरिमसमयणवकच धचरिमफालि विसयत्तेण चरिमाणुभागखडयविसयत्तेण च सामित्तपरूवण पडिविसेसाभावादो । जयध० २ समयाहियावलियस कसायो नाम सुहुमसपराइयो सगद्धाए समयाहियावलियसेसाए वट्टमाणो घेत्तव्यो । तस्स पयदजइण्णसामित्त दट्ठव्व; एत्तो मुहुमदरहाणीए लोहस जल्णाणुभागस कम णित्रघणाए अन्नस्थाणुवलद्धीदो | जयध० ३ कुदो; सुहुमहदसमुप्पत्तियकम्मेण जहण्णएणाणत मागवड्ढीए वड्ढिदम्मि सम्मत्तपडिलभ पडि ततो दस्स भेदाभावादो । जयध० ४ इत्थवेदस्स दुरिमाणुभागखडयचरिमफालिं सकामिय चरिमाणुभागलडय ढमसमए वट्टमाणस्स जहणिया हाणी होइ, तत्थ खवगपरिणामेहि घादिदावसेसस्स तदणुभागस्स सुट्ट्टु जहण्णहाणीए हाइदूण सकतिदसणादो | जयध० ५ कुदो; पढमसमए जद्दष्णहाणिविसयीकयाणुभागस्स विदियसमए तत्तियमेत्तपमाणेणावादमणादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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