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________________ ३७२ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार २७३. अपच्चक्खाणमाणस्स जहण्णाणुभागसंक्रमो अणंतगुणो। २७४. कोधस्स जहण्णाणुभागसंकमो विसेसाहिओ। २७५. मायाए जहण्णाणुभागसंकमो विसेसाहिओ । २७६. लोभस्स जहण्णाणुभागसंकमो विसेसाहिओ । २७७, पञ्चक्खाणमाणस्स जहण्णाणुभागसंकमो अणंतगुणों । २७८. कोहस्स जहण्णाणुभागसंकमो विसेसाहिओ । २७९. मायाए जहण्णाणुभागसंकमो विसेसाहिओ । २८०. लोभस्स जहण्णाणुभागसंकमो विसेसाहिओ। २८१. माणसंजलणस्स जहण्णाणुभागसंकमो अणंतगुणों । २८२. कोहसंजलणस्स जहण्णाणुभागसंकमो विसेसाहिओ । २८३. मायासंजलणस्स जहण्णाणुभागसंकमो विसेसाहिओ । २८४. लोभसंजलणस्स जहण्णाणुभागसंकमो विसेसाहिओ । २८५. मिच्छत्तस्स जहण्णाणुभागसंकमो अणंतगुणों । २८६. जहा णिरयगईए तहा सेसासु गदीसु ।। चूर्णिसू०-नपुंसकवेदसे अप्रत्याख्यानावरण मानका जघन्य अनुभागसंक्रमण अनन्तगुणित है । अप्रत्याख्यानावरण मानसे अप्रत्याख्यानावरण क्रोधका जघन्य अनुभागसंक्रमण विशेष अधिक है । अप्रत्याख्यानावरण क्रोधसे अप्रत्याख्यानावरण मायाका जघन्य अनुभागसंक्रमण विशेप अधिक है । अप्रत्याख्यानावरण मायासे अप्रत्याख्यानावरण लोभका जघन्य अनुभागसंक्रमण विशेष अधिक है । अप्रत्याख्यानावरण लोभसे प्रत्याख्यानावरण मानका जघन्य अनुभागसंक्रमण अनन्तगुणित है । प्रत्याख्यानावरण मानसे प्रत्याख्यानावरण क्रोधका जघन्यअनुभागसंक्रमण विशेप अधिक है। प्रत्याख्यानावरण क्रोधसे प्रत्याख्यानावरण मायाका जघन्य अनुभागसंक्रमण विशेष अधिक है। प्रत्याख्यानावरण मायाके जघन्य अनुभाग-संक्रमणसे प्रत्याख्यानावरण लोभका जघन्य अनुभागसंक्रमण विशेप अधिक है ॥२७३-२८०॥ चूर्णिसू०-प्रत्याख्यानावरण लोभसे संज्वलन मानका जघन्य अनुभागसंक्रमण अनन्तगुणित है। संज्वलनमानसे संज्वलनक्रोधका जघन्य अनुभागसंक्रमण विशेष अधिक है। संज्वलन क्रोधसे संज्वलन मायाका जघन्य अनुभागसंक्रमण विशेष अधिक है। संज्वलन मायासे संचलन लोभका जघन्य अनुभागसंक्रमण विशेष अधिक है। संज्वलनलोभसे मिथ्यात्वका जघन्य अनुभागसंक्रमण अनन्तगुणित है ॥२८१-२८५।। चूर्णिस०-जिस प्रकारसे नरकगतिमे यह जघन्य अनुभागसंक्रमणका अल्पवहुत्व कहा है, उसी प्रकारसे शेप गतियोमे भी जघन्य अनुभागसंक्रमणका अल्पबहुत्व जानना चाहिए ॥२८६।। १ कुदो, णोकसायाणुभागादो कसायाणुभागस महल्लत्तसिद्धीए णाइयत्तादो । जयध० २ कुदो; सयलसजमवादित्तण्णहागुववत्तीए तस्स सम्भावसिद्धीदो। जयघ० ३ कुदोजहास्वादसजमवादणसत्तिसमष्णिदत्तादो । जयध० ४ कुदो; सयलपदत्यविसवसद्दहणलक्खणसम्मत्तण्णिदजीवगुणपादणप्णहाणुववतीदो । जयव०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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