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________________ गा० ५८ ] अनुभाग संक्रम- अल्पबहुत्व-निरूपण ३७१ २५८. रियईए सव्वत्थोवो सम्मत्तस्स जहण्णाणु भागसंकमो' २५९. सम्मामिच्छत्तस्स जहण्णाणुभागसंकमो अनंतगुणो' । २६०. अनंताणुवंधिमाणस्स जहण्णाणुभागसंकमो अंतगुणो | २६१. कोहस्स जहण्णाणुमागसंकमो विसेसाहिओ । २६२. पायाए जहण्णाणुभागसंकमो विसेसाहिओ । २६३ लोभस्स जहण्णाणुभागसंकमो विसेसाहिओ । २६४. इस्सस्स जहण्णाणुभागसंकमो अनंतगुणों । २६५. रदीए जहण्णाणुभागसंकमो अनंतगुणो । २६६. पुरिसवेदस्स जहण्णाणुभागसंकमो अनंतगुणा' । २६७ इत्थवेदस्स जहण्णाणुभागसंकमो अनंतगुण । २६८. दुर्गुछाए जहण्णाणुभागसंकमो अणंतगुणो । २६९. भयस्त जहण्णाणुभागसंकमो अनंतगुणो । २७०, सोगस्स जहण्णाणुभागसंकमो अनंतगुणो । २७१. अरदीए जहण्णाणुभागसंकमो अनंतगुणो । २७२. सयवेदस्स जहण्णाणुभागसंकमो अनंतगुणों । चूर्णिसू०-नरकगतिमें सम्यक्त्वप्रकृतिका जघन्य अनुभाग-संक्रमण सबसे कम है । सम्यक्त्वप्रकृतिसे सम्यग्मिथ्यात्वका जघन्य अनुभाग-संक्रमण अनन्तगुणित है । सम्यग्मिथ्यात्व - से अनन्तानुवन्धी मानका जघन्य अनुभाग-संक्रमण अनन्तगुणित है । अनन्तानुबन्धी मानसे अनन्तानुबन्धी क्रोधका जघन्य अनुभाग - संक्रमण विशेष अधिक है । अनन्तानुवन्धी क्रोधसे अनन्तानुबन्धी मायाका जघन्य अनुभाग-संक्रमण विशेष अधिक है । अनन्तानुबन्धी मायासे अनन्तानुवन्धी लोभका जघन्य अनुभाग-संक्रमण विशेष अधिक है ।। २५८-२६३॥ चूर्णिसू० - अनन्तानुबन्धी लोभसे हास्यका जघन्य अनुभाग-संक्रमण अनन्तगुणित है । हास्यसे रतिका जघन्य अनुभागसंक्रमण अनन्तगुणित है । रतिसे पुरुषवेदका जघन्य अनुभागसंक्रमण अनन्तगुणित है । पुरुषवेदसे स्त्रीवेदका जघन्य अनुभागसंक्रमण अनन्तगुणित है | स्त्रीवेदसे जुगुप्साका जघन्य अनुभागसंक्रमण अनन्तगुणित है । जुगुसासे भयका जघन्य अनुभागसंक्रमण अनन्तगुणित है । भयसे शोकका जघन्य अनुभागसंक्रमण अनन्तगुणित है । शोकसे अरतिका जघन्य अनुभागसंक्रमण अनन्तगुणित है । अरतिसे नपुंसकवेदका जघन्य अनुभागसंक्रमण अनन्तगुणित है ॥२६४-२७२।। १ कुदो देसघादिएयट्ठाणियसरूवत्तादो | जयध० २ कुदो; सव्वघादिविट्ठाणियसरूवत्तादो । जयध० ३ कुदो, सम्मामिच्छत्तुक्कस्साणुभागादो अणतगुणभावेणावट्ठिदमिच्छत्त जहण्णफद्दय पहुडि उवरि विद्वाणुभागविण्णासस्सेदस्स तत्तो अणतगुणत्तसिद्धीए पडिवधाभावादो । जयध० ४ सुहुमेइ दियहदसमुप्पत्तियकम्मादो अणतगुणहीणो पुविल्लो णवकबधाणुभागस कमो । एसो युग सुहुमाणुभागादो अणतगुणो; असण्णिपचिदियहदसमुप्पत्तियकम्मेण णेरइएस लडजहण्णभावत्तादो । तदो सिद्धमेदस्स तत्तो अणतगुणत्त । जयघ० ५ एत्थ कारण रदी रमणमेत्तुप्पाइया, पलालग्गिसणिहसत्तिविसेसो पुण पुवेदो । तदो सामित्तविसयभेदाभावे विसिद्ध मेदस्साणतगुणग्भहियत्त । जयध० ६ किं कारण ? कारिसग्गिसरिस तिव्वपरिणामणिव धणत्तादो । जयध० ७ किं कारण ? इट्ठावागग्गिस रिसपरिणामकारणत्तादो | जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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