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________________ ३७० कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार भयस्त जहण्णाणुभागसंकमो अणंतगुणो । २४५. सोगस्स जहण्णाणुभागसंकमो अणंतगुणो'। २४६. अरदीए जहण्णाणुभागसंकमो अणंतगुणो। २४७. इथिवेदस्स जहण्णाणुभागसंकमो अणंतगुणों । २४८. णबुंसयवेदस्स जहण्णाणुभागसंकमो अणंतगुणों। २४९. अपञ्चक्खाणमाणस्स जहण्णाणुभागसंकमो अणंतगुणों । २५०. कोहस्स जहण्णाणुभागसंकमो विसेसाहिओ । २५१. मायाए जहण्णाणुभागसंकमो विसेसाहिओ । २५२. लोभस्स जहण्णाणुभागसंकमो विसेसाहिओ २५३. पञ्चक्खाणमाणस्स जहण्णाणुभागसंकमो अणंतगुणों । २५४. कोहस्स जहण्णाणुभागसंकमो विसेसाहिओ । २५५. मायाए जहण्णाणुभागसंकमो विसेसाहिओ । २५६. लोभस्स जहण्णाणुभागसंक्रमो विसेसाहिओ । २५७. मिच्छत्तस्स जहण्णाणुभागसंकमो अणंतगुणों । अनुभागसंक्रमण अनन्तगुणित है। जुगुप्सासे भयका जघन्य अनुभाग-संक्रमण अनन्तगुणित है । भयसे शोकका जघन्य अनुभाग-संक्रमण अनन्तगुणित है । शोकसे अरतिका जघन्य अनुभागसंक्रमण अनन्तगुणित है। अरतिसे स्त्रीवेदका जघन्य अनुभागसंक्रमण अनन्तगुणित है । स्त्रीवेदसे नपुंसकवेदका जघन्य अनुभाग-संक्रमण अनन्तगुणित है ॥२४१-२४८|| चूर्णिसू०-नपुंसकवेदसे अप्रत्याख्यानमानका जघन्य अनुभाग-संक्रमण अनन्तगुणित है । अप्रत्याख्यान मानसे अप्रत्याख्यान क्रोधका जघन्य अनुभाग-संक्रमण विशेष अधिक है । अप्रत्याख्यान क्रोधसे अप्रत्याख्यान मायाका जघन्य अनुभाग-संक्रमण विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यान मायासे अप्रत्याख्यान लोभका जघन्य अनुभाग-संक्रमण विशेप अधिक है । अप्रत्याख्यान लोभसे प्रत्याख्यान मानका जघन्य अनुभाग-संक्रमण अनन्तगुणित है । प्रत्याख्यानमानसे प्रत्याख्यान क्रोधका जघन्य अनुभाग-संक्रमण विशेष अधिक है । प्रत्याख्यान क्रोधसे प्रत्याख्यानमायाका जघन्य अनुभाग-संक्रमण विशेप अधिक है। प्रत्याख्यानमायासे प्रत्याख्यानलोभका जघन्य अनुभाग-संक्रमण विशेष अधिक है । प्रत्याख्यान लोभसे मिथ्यात्वका जघन्य अनुभाग-संक्रमण अनन्तगुणित है ॥२४९-२५७॥ १ दुगुंछिदो देसच्चागमेत कुणटि । भयोदएण पुण पाणच्चागमवि कुणदि त्ति तिव्वाणुभागत्त मेदस्स दट्ठव्व । जयध० २ कुदो, छम्मासपजत्ततिव्वदुक्खकारणत्तादो । जयध० ३ कुदो; अंतोमुहुत्त हेट्ठा ओयरिदूण पुत्वमेव खविदत्तादो | जयध० ४ किं कारण ? कारिसग्गिसमाणो इस्थिवेदाणुभागो। णवुसयवेदाणुमागो पुण इछावागग्गिसमाणो, तेणाणतगुणो जादो | जयध० ५ कुदो, सुहुमेइदियहदसमुप्पत्तियकम्मेण लद्धजहण्णाणुभागस्सेदस्स अतरकरणे कदे खवगपरिणामेहि धादिदावसेसणवुसयवेदजहण्णाणुभागसकमादो अणतगुणत्तसिद्धीए णाइयत्तादो । जयध ६ कुदो, सयलसजमघादित्तष्णहाणुववत्तीदो । ण च देससंजमघादि अपञ्चक्खाणलोभजहण्णाणु भागादो अणतगुणत्ताभावे तत्तो अणतगुणसयलसनमधादित्तमेदत्स जुज्जदे, विप्पडिसेहादो । जयध ७ सबल पदत्यविसयसद्दहणपरिणामपडिबघत्तण लद्धमाहप्पत्सेदत्स तहाभावविरोहाभावादो । जयध° Tha Tho Tho ho
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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