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________________ २६ कसाय पाहुडसुत्त चूर्णिकारकी स्पष्टवादिता - कसायपाहुडचूर्णिके अध्ययनसे जहां चूर्णिकार के अगाध पांडित्य और विशाल आगम-ज्ञानका पता लगता है, वहां प्रस्तुत चूर्णिमे एक उल्लेख ऐसा भी है, जिससे कि उनकी स्पष्टवादिताका भी पता चलता है । चारित्रमोहक्षपरणा-अधिकार में क्षपककी प्ररूपणा करते हुए, यवमध्यकी प्ररूपणा करना आवश्यक था । उस स्थल पर चूर्णिकार उसे न कर सके । आगे चलकर प्रकरणकी समाप्ति पर चूर्णिकार लिखते हैं "जवमज्यं कायव्वं, विस्सरिदं लिहिदु । ” - ( पृ० ८४०, सू० ६७६ ) अर्थात् यहां पर यवमध्यकी प्ररूपणा करना चाहिए । पहले क्षपक- प्रायोग्य प्ररूपणा के अवसर में हम लिखना भूल गये । इतने महान् आचार्यकी यह स्पष्टवादिता देखकर कौन उनकी वीतरागता पर मुग्ध हुए विना न रहेगा ? इस उल्लेख से जहाँ चूर्णिकार के हृदयकी सरलता और निरहकारिताका पता लगता है, वहां एक नई बातका और भी पता लगता है कि कसायपाहुडकी चूर्णि उन्होंने अपने हाथसे लिखी थी, यही कारण है कि वे 'लिहिदु" पदका प्रयोग कर रहे हैं। यदि उन्होंने यह चूर्णि बोल करके किसी और के द्वारा लिखाई होती, तो 'लिहिदु' प्रयोग न करते और उसके स्थान पर 'भणिदु' या 'परूवेदु' जैसे किसी अन्य पदका प्रयोग करते । यहां यह पूछा जासकता है कि जब उन्होंने प्रस्तुत चूर्णिको अपने ही करकमलों से लिखा है, तब वह यवमध्यरचना जहाँ आवश्यक थी, वहीं पीछे उसे क्यों नहीं लिख दिया ? इसका उत्तर जवलाकार ने यह दिया है कि वीतरागी और आगमके वेत्ता यतिवृपभ जैसे श्राचार्यसे ऐसी भूल होना संभव नहीं है । शिष्यों को प्रकृत अर्थ संभलवानेके लिए उन्होंने वस्तुतः अन्त दीपकरूप से उसका यहां उल्लेख किया है । जो कुछ भी हो, पर चूर्णिकारकी उक्त स्पष्टवादितासे उनकी वीतरागता, निरहंकारिता सरलता और महत्ताका अवश्य आभास मिलता है । उच्चारणावृत्ति उच्चारणावृत्ति क्या है ? - चूर्णिकारने प्रस्तुत ग्रन्थकी व्याख्यामे जिन-जिन विपयों की प्ररूपणा अत्यन्त आवश्यक समझी, उनकी प्ररूपणा ओघ (सामान्य) से करके आदेश (विशेप) से या तो प्ररूपणा ही नहीं की, अथवा गति, इन्द्रिय आदि एकाध मार्गणासे करके, शेष मार्गणाओंकी प्ररूपणा करनेका भार समर्पण सूत्रों के द्वारा उच्चारणाचार्यों या व्याख्यानाचार्योंको सौंपा है, जिसका अनुमान पाठकगण परिशिष्ट नं० ६ से लगा सकेंगे । भ० महावीरके निर्वाणके पश्चात् उनका उपदेश श्रुतकेवलियोंके समय तक तो मौखिक ही चलता रहा । किन्तु उनके पश्चात् विविध अंगों और पूर्वोके विषयोंको कुछ विशिष्ट आचार्याने उपसंहार करके गाथा-सूत्रोंमे निवद्ध किया । गाथा शब्दका अर्थ है-गाये जाने वाले गीत । और सूत्र का अर्थ है - महान और विशाल अर्थके प्रतिपादक शब्दोंकी संक्षिप्त रचना, जिसमें कि सांकेतिक बीज पके द्वारा विवक्षित विपयका पूर्ण समावेश रहता है । इस प्रकारके गाथासूत्रोंकी रचना करके उनके रचयिता श्राचार्य अपने सुयोग्य शिष्यों को गाथासूत्रों के द्वारा सूचित अर्थके उच्चारण करने की विधि और व्याख्यान करनेका प्रकार बतला देते थे और वे
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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