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________________ प्रस्तावना व्योच्छिण्णसंपदायकमेणागच्छमाणो जो सिस्सपरंपराए पवाइज्जदे परणविज्जदे, सो पवाइज्जतोवएसो त्ति भएणदे । अथवा अज्जमखुभयवंताणमुवएसो एत्थापवाइज्जमाणो णाम । णागहत्थिखवणाणमुवएसो पवाइज्जतो त्ति घेत्तव्यं ।" अर्थात् जो उपदेश सर्व प्राचार्योंसे सम्मत है, चिरकालसे अविच्छिन्न सम्प्रदायक्रमसे आ रहा है और शिष्य-परम्पराके द्वारा प्रवाहित किया जारहा है-जिज्ञासु जनोंको प्रज्ञापित किया जारहा है-उसे पवाइज्जत उपदेश कहते हैं । ( इससे विपरीत उपदेशको अपवाइज्जंत उपदेश जानना चाहिए। ) अथवा भगवन्त आर्यमञ्जका उपदेश अपवाइज्जंत और नागहस्तिक्षपणकका उपदेश पवाइज्जत जानना चाहिए । यद्यपि इस अवतरणमें स्पष्टरूपसे आर्यमंतुके उपदेशको अप्रवाह्यमान और नागहस्तीके उपदेशको प्रवाह्यमान बतलाया गया है, तथापि आगे चलकर जो उन्होंने उक्त शब्दोंका अर्थ किया है, वह उनकी स्थितिको सन्देहकी कोटिमें डाल देता है। यथा (२) उक्त स्थलसे आगे चूर्णिकार कहते है४५. तेसि चेव उवदेसेण चोदसजीवसमासेहिं दंडगो भणिहिदि । ___ (पृ० ५६४ सू० ४५) इस सूत्रका अर्थ करते हुए जयधवलाकार कहते हैं "तेसि चेव भयवंताणमज्जमखु-णागहत्थीणं पवाइज्जतेणुवएसेण चोद्दसजीवसमासेसु जहएणुकस्सपदविसेसिदो अप्पाबहुअदंडो एत्तो भणिहिदि भणिष्यत इत्यर्थः ।" अर्थात् उन्हीं भगवन्त आर्यमंच और नागहस्तीके प्रवाह्यमान उपदेशके अनुसार चौदह जीवसमासोंकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट कषायोंके काल-सम्बन्धी अल्पबहुत्व-दंडकको कहेगे। पाठकगण यहा स्वयं अनुभव करेंगे कि जयधवलाकारका यह पूर्वापर-विरुद्ध कथन कैसा ? इसके पूर्व इसी प्रकरणके १६ वें चूर्णिसूत्रकी व्याख्या करते हुए जब वे आर्यमंक्षुके उपदेशको अप्रवाह्यमान और नागहस्तीके उपदेशको प्रवाह्यमान बतला आये हैं, तब यहां पर ४५ वें सूत्रकी व्याख्यामें उन दोनों ही प्राचार्योंके उपदेशको प्रवाह्यमान कैसे कह रहे हैं ? निश्चयतः जयधवलाकारका यह कथन पाठकको सन्देहकी कोटिमें डाल देता है। धवलाकारने षट्खंडागमकी व्याख्यामें अनेक स्थानों पर उत्तरप्रतिपत्ति और दक्षिण प्रतिपत्तिका उल्लेख किया है। ज्ञात होता है कि नागहस्तीकी प्रवाह्यमान उपदेश-परम्परा आगे चलकर दक्षिण प्रतिपत्तिके नामसे और आर्यमंचकी अप्रवाह्यमान उपदेश-परम्परा उत्तर प्रतिपत्तिके नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त हुई है। । उक्त दो स्थलोंके अतिरिक्त अन्य स्थलों पर भी चूर्णिकारने उक्त दोनों प्रकारके उपदेशोंका अनेक वार उल्लेख किया है, जिसे परिशिष्ट नं० ७ से जानना चाहिए । यतः आचार्य यतिवृपभने आर्यमंतु और नागहस्ती दोनोंसे ही आगम-विपयक ज्ञान प्राप्त किया था और जयधवलाकारने उन्हे दोनोंका शिष्य बतलाया है, अतः इतना तो सुनिश्चित __ है कि चूर्णिकारने दोनो उपदेशोंके द्वारा अपने दोनों गुरुओंके मत-भेदोंका निर्देश किया है।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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