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________________ ३६८ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार मुक्कस्सेण संखेज्जाणि वासाणि । २२२. अणंताणुवंधीणं जहण्णाणुभागसंकामयंतरं केवचिरं कालादो होदि ? २२३. जहण्णेण एयसमओ। २२४ उक्कस्सेण असंखेज्जा लोगा । २२५. एदेसि सव्वेसिमजहण्णाणुभागस्स केवचिरमंतरं ? २२६. णस्थि अंतरं । २२७. अप्पाबहुअं । २२८. जहा उक्कस्साणुभागविहत्ती तहा उक्कस्ताणुभागसंकयो । २२९. एत्तो जहण्णयं । २३०. सव्वत्थोवो लोहसंजलणस्स जहण्णाणुभागसंको। २३१. मायासंजलणस्त जहणाणुभागसंकयो अणंतगुणों । २३२. माणसंजलणस्स जहण्णाणुभागसंकमो अणंतगुणों । २३३, कोहसंजलणस्स जहण्णाणु शंका-अनन्तानुवन्धी कपायोके जघन्य अनुभाग-संक्रामकोका अन्तरकाल कितना है ? ॥२२४॥ समाधान-जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल असंख्यात लोकप्रमाण है ।।२२३-२२४॥ शंका-इन सभी कर्मों के अजघन्यानुभाग-संक्रामकोका अन्तरकाल कितना है ? ॥२२५।। समाधान-उक्त सभी कर्मो के अजघन्यानुभाग-संक्रामकोका कभी अन्तर नहीं होता है ॥२२६॥ चूर्णिसू०-अव अनुभाग-संक्रामकोके अल्पवहुत्वको कहते है। (वह अल्पबहुत्व दो प्रकारका है-उत्कृष्ट अनुभाग-संक्रामक-विषयक और जघन्य अनुभाग-संक्रामक-विषयक । ) जिस प्रकार उत्कृष्ट अनुभागविभक्तिका अल्पवहुत्व कहा है, उसी प्रकार उत्कृष्ट अनुभागसंक्रामक-विपयक अल्पबहुत्व जानना चाहिए ॥२२७-२२८॥ चूर्णिसू-अव इसके आगे जघन्य अनुभाग-संक्रामकोका अल्पवहुत्व कहते हैंसंज्वलन लोभका जघन्य अनुभाग-संक्रमण सबसे कम है। इससे संज्वलन मायाका जघन्य अनुभाग-संक्रमण अनन्तगुणित है। संज्वलन मायासे संज्वलन मानका जघन्य अनुभागसंक्रमण अनन्तगुणित है । संज्वलनमानसे संचलन क्रोधका जघन्य अनुभाग-संक्रमण अनन्त सजलणाण पि पयदुक्कस्सनर वत्तव । णवरि माणसजलणस्स माया-लोभोदएहि, माया-सजलणस्स च लोभोदएण चढाविय अतरावेयव्य Ixxx एवं चेव पुरिसवेदस्स वि सोदएणादि कादूण परोदएणतरिदत्स सादिरेयवासमेत्तुक्कस्सतरसभवो दट्ठव्वो । जयध० १ णqसयवेदोदएणादि कादूण अणप्पिदवेदोदएण वासपुधत्तमेत्तमतरिदस्स तदुवलभादो । जयध० २ जहण्णपरिणामेणादिं कादूणासखेजलोगमेत्तेहिं अजहण्णपाओग्गपरिणामेहिं चेव सजोजयताण णाणाजीवाणमेटमुक्कत्सतरं लव्मदि । जयध० ३ कुदो; सुहुमकिट्टिसरूवत्तादो । जयघ० ४ कुदो; बादरकिट्टीसलवेण पुवमेवाणियट्टिपरिणामेहि लद्धजहण्णभावत्ताटो । जयव० ५ कुदो; जहण्णसामित्तविसवीकयमायासजलणचरिमणवक्रबंधादो जहाफममणतगुणसलवणावछिद मायातदिय-विदियपढमसगहकिट्टीहितो वि माणसजलणणवकवसरूवल्सेदस्साणतगुणत्तदसणादो | जयध
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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