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________________ ३६६ कलाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार केवचिरं कालादो होंति ? १९६. जहण्णुकस्सेण अंतोमुहुत्त' । १९७. अणंताणुवंधीणं जहण्णाणुभागसंकामया केवचिरं कालादो होति ? १९८. जहण्णेण एयसमओ। १९९. उकस्सेण आवलियाए असंखेज्जदिभागों । २००. एदेसि कम्माणमजहण्णाणुभागसंकामया केवचिरं कालादो होति ? २०१. सव्वद्धा। २०२. णाणाजीवेहि अंतरं । २०३. मिच्छत्तस्स उकस्साणुभागसंकामयाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? २०४. जहण्णेणेयसमओ । २०५. उक्कस्सेण असंखेज्जा लोगा। २०६. अणुकस्साणुभागसंकामयाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? २०७. शंका-सम्यग्मिथ्यात्व और आठ नोकपायोके जघन्य अनुभागसंक्रामकोका कितना काल ? ॥१९५॥ समाधान-जघन्य और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है ॥१९६।। शंका-अनन्तानुबन्धी कषायोके जघन्य अनुभाग-संक्रामकोका कितना काल है ? ।।१९७।। समाधान-जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल आवलीका असंख्यातवाँ भाग है ॥१९८-१९९।। शंका-इन उपयुक्त सर्व कर्मोंके अजघन्य अनुभाग-संक्रामक जीवोका कितना काल है ? ॥२०॥ समाधान-उक्त सर्व कर्मोंके अजघन्य अनुभागके संक्रामक जीव सर्वकाल पाये जाते हैं ॥२०१।। चूर्णिसू०-अब नाना जीवोकी अपेक्षा उत्कृष्ट अनुभागके संक्रामकोका अन्तर कहते है ।।२०२॥ शंका-मिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुभाग-संक्रामकोका अन्तरकाल कितना है ? ॥२०३॥ समाधान-जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल असंख्यात लोकके समयप्रमाण है ॥२०४-२०५॥ शंका-मिथ्यात्वके अनुत्कृष्ट अनुभाग-संक्रामकोका अन्तरकाल कितना है ? ॥२०६॥ १ जपणेण ताव तेसिमप्पप्पणो चरिमाणुभागखंडयकालो घेत्तव्यो । उकस्सेण सो चेव छायादिट्टतेण लद्धाणुसधाणो घेत्तन्बो | जयध० २ कुदो, विसजोयणापुबसंजोगपढमसमए जहण्णपरिणामेण बद्धजपणाणुभागमावलियादीदमेयसमय सकामिय विदियसमए अजहण्णभावपरिणदणाणाजीवेसु तदुवलमादो । जयध० ३ कुदो; आवलियाए असखेत्रदिभागमेत्ताणचेव गिरतरोवक्कमणवाराणमेत्थ सभवदसणादो । जयघ० ४ तं जहा-मिच्छत्तुक्कस्साणुभागसंकामयणाणाजीवाण पवाहविच्छेदवसेणेयसमयमतरिदाण विदियसमए पुणरुमवो दिलो । लद्धमतर जहण्णेणेयसमयमेत्त । जयध ५ कुदो; उकस्साशुभागवधेण विणा सयजीवाणमेत्तियमेत्तकालमवठ्ठाणसमपादो। जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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