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________________ ३६५ गा० ५८] अनुभागसंक्रम-काल-निरूपण असंखेज्जदिभागो' । १८४. अणुक्कस्साणुभागसंकामया सव्वद्धा । १८५. एवं सेसाणं कम्माणं । १८६. गवरि सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणमुक्कस्साणुभागसंकामया सव्वद्धा । १८७. अणुक्कस्साणुभागसंकामया केवचिरं कालादो होति ? १८८. जहण्णुकस्सेण अंतोमुहुत्तं । १८९. एत्तो जहण्णकालो।१९० मिच्छत्त-अट्ठकसायाणं जहण्णाणुभागसंकामया केवचिरं कालादो होंति ? १९१. सव्वद्धा। १९२. सम्मत्त-चदुसंजलण-पुरिसवेदाणं जहण्णाणुभागसंकामया केवचिरं कालादो होंति ? १९३. जहण्णेणेयसमा । १९४. उक्कस्सेण संखेज्जा समयाँ । १९५.सम्मामिच्छत्त-अट्ठणोकसायाणं जहण्णाणुभागसंकामया चूर्णिम् ०-मिथ्यात्वके अनुत्कृष्ट अनुभाग-संक्रामक सर्वकाल पाये जाते है। इसी प्रकार शेष कर्मों के अनुभागसंक्रामकोका काल जानना चाहिए। विशेपता केवल यह है कि सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुभागके संक्रामक सर्वकाल होते है ॥१८४-१८६॥ शंका-सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वके अनुत्कृष्ट अनुभाग-संक्रामक जीवोका कितना काल है ? ॥१८७।। समाधान-जघन्य और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है ।। १८८।। चूर्णिसू०-अब इससे आगे जघन्य अनुभागसंक्रमण करनेवालोंका काल कहते हैं ॥१८९॥ शंका-मिथ्यात्व और आठ मध्यम कपायोके जघन्य अनुभागसंक्रामकोका कितना काल है १ ।।१९०॥ समाधान-सर्व काल है ॥१९१॥ शंका-सम्यक्त्वप्रकृति, चारो संज्वलन और पुरुपवेदके जघन्य अनुभाग-संक्रामकोका कितना काल है १ ॥१९२।। समाधान-जघन्यकाल एक समय , और . उत्कृष्टकाल संख्यात समय है ॥१९३-१९४॥ १ त जहा-एयजीवस्सुक्कस्साणुभागसकमकालमतोमुहुत्तपमाण ठविय तप्पाओग्गपलिदोवमासखेजभागमेत्ततदणुसधाणवारसलागाहि गुणेयव्व । तदो पयदुक्कस्सकालपमाणमुप्पजदि । जयध० २ कुदो; सव्वकालमविच्छिण्णपवाहसरूवेणेदेसिमबाणदसणादो । जयध० ३ कुदो; सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणमुक्कस्साणुभागसकामयवेदगसम्माइट्ठीणमुब्वेल्लमाणमिच्छाइट्ठीण च पवाहवोच्छेदाणुवलभादो | जयध० ४ दसणमोहक्खवणादो अण्णत्थ तदणुवलभादो | जयध० ५ कुदो; सुहुमेइ दियजीवाण हदसमुप्पत्तियजहण्णसतकम्मपरिणदाण तिसु वि कालेसु वोच्छेदाणुवलभादो । जयध० ६ कुदो, सम्मत्तस्स समयाहियावलियअक्खीणदसणमोहणीयम्मि लोभसजलणस्स समयाहियावलियसकसायम्मि सेसाण अप्पप्पणो णवकबधचरिमफालिसंकमणावत्याए जहण्णभावाणमेयममयोवलद्धीए बाहाणुवलभादो। जयध० ७ कुदो, संखेजवारमणुसंधाणवसेण तदुवलभादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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