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________________ ३६४ __ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार असंकामया च संकामया च 1 १७३. एवं सेसाणं कम्माणं। १७४. णवरि सम्मत्तसम्मामिच्छत्ताणं संकामगा-पुत्वं ति भाणिदव्वं । १७५. जहण्णाणुभागसंकमभंगविचओ। १७६. मिच्छत्त-अहकसायाणं जहण्णाणुभागस्स संकामया च असंकामया च । १७७. सेसाणं कम्माणं जहण्णाणुभागस्स सव्वे जीवा सिया असंकामयाँ। १७८. सिया असंकामया च संकामओ च । १७९. सिया असंकामया च संकामया च । १८०. णाणाजीवेहि कालो । १८१. मिच्छत्तस्स उकस्साणुभागसंकामया केवचिरं कालादो होंति ? १८२. जहणणेण अंतोमुहुत्तं । १८३. उक्क स्सेण पलिदोवमस्स जीव असंक्रामक और अनेक संक्रामक होते है। जिस प्रकार यह मिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुत्कृष्ट अनुभागसंक्रामकोका भंगविचय किया है, उसी प्रकारसे शेप कर्मोंके उत्कृष्ट अनुभागसंक्रामकोका भंगविचय जानना चाहिए। विशेपता केवल यह है कि सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुभाग-संक्रामकोके भंग संक्रामक-पदपूर्वक कहना चाहिए ।।१७०-१७४।। चूर्णिमू०-अव जघन्य अनुभागसंक्रामकोका भंगविचय कहते है । मिथ्यात्व और आठ मध्यम कपायोंके जघन्य अनुभागके अनेक जीव संक्रामक भी होते हैं और अनेक जीव असंक्रामक भी होते हैं शेष कोंके जघन्य अनुभागके सर्व जीव कदाचित् असंक्रामक होते है । कदाचित् अनेक असंक्रामक और कोई एक जीव संक्रामक भी होता है । कदाचित् अनेक असंक्रामक और अनेक संक्रामक भी होते है ।।१७५-१७९।। चूर्णिसू ० --अब नाना जीवोकी अपेक्षा उत्कृष्ट अनुभागसंक्रामकोका काल कहते हैं ॥१८०॥ शंका-मिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुभागके संक्रामक जीवाका कितना काल है? ॥१८१।। समाधान-जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्टकाल पल्योपमका असंख्यातवॉ भाग है ।।१८२-१८३।। १ कदाइमुक्कस्साणुभागस्सासकामयसव्वजीवाण मज्झे केत्तियाण पि जीवाणमुक्कस्साणुभागसंका मयभावेण परिणदाणमुवलभादो | जयध० २ त जहा-सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणमुक्कस्साणुभागस्त सिया सव्वे जीवा सकामया १, सिया एदे च असंकामओ च २, सिया एटे च असंकामया च ३। एवमणुककस्सागुभागसंकामयाण पि विवजासेण तिण्ह भगाणमालावो कायन्बो त्ति एस विसेसो सुत्तेणेदेण जाणाविदो । जयध० ३ कुदो एवं; सुहुमेइदियहदसमुप्पत्तियकम्मेण लद्धजहण्णभावाणमेदेसि तदविरोहादो | जयध ० ४ कुदो; दसण-चरित्तमोहक्खवयाणमणताणुवाधिसजोइयाण च सम्बद्धमणुवलभादो । जयध० ५ कुदो असंकामयाण धुवभावेण कदाइमेयजीवत्स जहण्णभावपरिणदत्स परिप्फुडमुवलभादो । जयध० ६ कुदो; असकामयाणं धुवमावेण केत्तियाणं पि जीवाण जहण्णाणुभागमकामयभावपरिणदाणमुवलभादो । जथध० ७ तं कथ १ सत्तट्ठ जणा बहुगा वा वधुकरसाणुभागा सयजहणमतोमुत्तमेन कालं संकामया होदूण पुणो कंडयघादवसेणाणुकसभावमुरगया । लद्धो सुत्तुठ्जिदण्णकालो । जपध
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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