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________________ गा० ५८] अनुभागसंक्रम-भंगविचय-निरूपण ३६३ विज्जमाणेहि भणियव्वं । १६५. पुरिसवेदस्स जहण्णाणुभागं संकामेंतो चदुण्हं कसायाणं णियमा अजहण्णमणंतगुणब्भहियं । १६६. कोधादितिए उवरिल्लाणं संकामओ णियमा अजहण्णमणंतगुणब्भहियं । १६७. लोहसंजलणे णिरुद्धे णस्थि सण्णियासो। . १६८. गाणाजीवेहि भंगविचओ दुविहो-उक्कस्सपदभंगविचओ जहण्णपदभंगविचओ च । १६९ तेसिमट्ठपदं काऊण । १७०. मिच्छत्तस्स सव्वे जीवा उक्कस्साणुभागस्स असंकामयाँ। १७१. सिया असंकामया च संकामओ च । १७२. सिया यहॉपर सम्यक्त्वप्रकृतिकी विद्यमानताके साथ सम्यग्मिथ्यात्वके जघन्य अनुभागसंक्रमणका सन्निकर्ष कहना चाहिए । पुरुषवेदके जघन्य अनुभागका संक्रमण करनेवाला जीव चारो संज्वलन कषायोके अनन्तगुण अधिक अजघन्य अनुभागका नियमसे संक्रमण करता है। संज्वलन क्रोधादित्रिकके जघन्य अनुभागका संक्रमण करनेवाला जीव उपरितन कपायोके अनन्तगुणा अधिक अजघन्य अनुभागका नियमसे संक्रामक होता है। संज्वलन लोभके निरुद्ध करनेपर सन्निकर्ष नहीं है ।।१६१-१६७।। चूर्णिसू०-नाना जीवोकी अपेक्षा भंगविचय दो प्रकारका है-उत्कृष्टपदभंगविचय और जघन्यपदभंगविचय । इन दोनोके अर्थपदको कहकर उन दोनोकी प्ररूपणा करना चाहिए ।।१६८-१६९॥ विशेषार्थ-वह अर्थपद इस प्रकार है-जो जीव उत्कृष्ट अनुभागके संक्रामक होते हैं, वे अनुत्कृष्ट अनुभागके असंक्रामक होते है और जो अनुत्कृष्ट अनुभागके संक्रामक होते है, वे उत्कृष्ट अनुभागके असंक्रामक होते है। इसी प्रकार जघन्य-अजघन्य अनुभागसंक्रामकोका भंगविचय-सम्बन्धी अर्थपद जानना चाहिए। चूर्णिसू०-सभी जीव मिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुभागके असंक्रामक होते हैं। कदाचित् अनेक जीव असंक्रामक होते हैं और कोई एक जीव संक्रामक होता है। कदाचित् अनेक १ तेसिं पुण अजहण्णाणुभागमणतगुणब्भहिय चेव सकामेदि, उवरि किट्टीपनाएण लद्धजहष्णभावाणमेत्थ तदविरोहादो । जयध० २ कोधादितिगे सजलणसण्णिदे णिरुद्धे हेछिल्लाण णत्थि सणियासो, असतकम्मिए तविरोहादो। उवरिल्लाणमत्थि, कोहसजलणे णिरुद्धे माण-माया लोहसजलणाण, माणसजलणे णिरुद्ध माया-लोहसजलणाण, मायासजलणे णिरुद्धे लोहसजलणस्त सकमस भवोवलभादो । जयध० ____३ किं तमट्ठपद ? वुच्चदे-जे उक्कस्साणुभागसकामया ते अणुक्कस्साणुभागस्स अस कामया, जे अणुक्कस्साणुभागसकामया ते उक्कस्साणुभागस्स असकामया। कुदो ? जेसिं सतकम्ममस्थि तेसु पयद; अकम्मेहि अव्यवहारो । जयध० ४ कुदो; मिच्छत्तुक्कस्साणुभागसकामयाणमधुवभावित्तादो । जयध ५ कुदो, सव्वजीवाणमुक्कस्साणुभागस्स असकामयाण मज्झे कदाइमेयजीवस्स तदुक्कस्साणुभागसकामयत्तण परिणदस्सुवलभादो । जयध० * ताम्रपत्रबाली प्रतिमें इस सूत्रको ऊपरके सूत्रकी टीकामें सम्मिलित कर दिया है । ( देखो पृ० ११४२ पंक्ति ४)
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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