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________________ गा० ५८ ] अनुभाग संक्रम- सन्निकर्ष-निरूपण १४६. जहणेण एयसमओ । १४७. उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं । १४८. सणियासो । १४९. मिच्छत्तस्स उकस्साणुभागं संकायेंतो सम्मत्तसम्मामिच्छत्ताणं जड़ संकामओ णियमा उक्कस्तयं संकामेदि । १५०. सेसाणं कम्माणं उक्कसं वा अणुक्कसं वा संकामेदि । १५१. उक्कस्सादो अणुक्कस्सं छड्डाणपदिदं । १५२. एवं सेसाणं कम्माणं णादूण दव्वं । ३६१ १५३. [जहण्णओ] सष्णियासो । १५४. मिच्छत्तस्स जहण्णाणुभागं संकामें तो सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं जइ संकामओ णियमा अजहण्णाणुभागं संकामेदि । १५५. समाधान-जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त है ।।१४६-१४७॥ चूर्णिसू० ०-अब उत्कृष्ट अनुभाग-संक्रमण करनेवाले जीवोका सन्निकर्ष कहते हैमिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुभागका संक्रमण करनेवाला जीव यदि सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वका संक्रमण करता है, तो नियमसे उत्कृष्ट अनुभागका संक्रमण करता है और शेष कर्मोंके उत्कृष्ट अनुभागका भी संक्रमण करता है, अथवा अनुत्कृष्ट अनुभागका भी संक्रमण करता है । शेष कर्मोंका उत्कृष्ट अनुभाग-संक्रमणसे अनुत्कृष्ट अनुभाग-संक्रमण षट्स्थानपतित हानिरूप होता है । जिस प्रकार मिथ्यात्व के साथ शेष कर्मोंके सन्निकर्ष का विधान किया गया है, उसी प्रकार शेष कर्मोंको भी पृथक् पृथक् निरूपण करके उत्कृष्ट अनुभागका सन्निकर्प लगा लेना चाहिए ।। १४८-१५२॥ चूर्णिस् ० - जव जघन्य अनुभाग-संक्रमण करनेवाले जीवोंका सन्निकर्ष कहते है - मिध्यात्वके जधन्य अनुभागका संक्रमण करनेवाला जीव यदि सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वका संक्रमण करता है, तो नियमसे अजघन्य अनुभागका संक्रमण करता है । १ सव्वोवसामणाए एयसमयमतरिय विदियसमए काल काढूण देवेसुप्पण्णपढमसमए सकामयत्तमुवगयम्मि तदुवलभादो | जयध० २ सव्वोवसामणा सव्वचिरकाल्मतरिय पडिवादवसेण पुणो सकामयत्तमुवगयस्स पयदतर समागोवलभादो । जयध० १३ मिच्छत्तुकस्साणुभाग सकामओ सम्मत्त सम्मामिच्छत्ताणं सिया सतकम्मिओ, सिया असतकम्मिओ । सतकम्मिओ वि सिया सकामओ, आवलियपविट्ठसत कम्मियस्स वि सभवोवलभादो । जब सकामओ, णियमा सो उक्कस्सं सकामेह, दसणमोहक्खत्रणादो अण्णत्थ तदणुक्कस्तभावाणुप्पत्तीदो । जयध ४ कुदो, मिच्छन्तु कस्सा णुभागस कामयम्मि सोलसक साय णत्रणोकसायाणमुक्कस्साणुभागस्स तत्तो छट्ठाणहीणाणुभागस्स वि विसेसपच्चयवसेण समव पडि विरोहाभावादो । जयध ० ५ किं कारणं ? णिरुद्धमिच्छत्तुकस्साणुभाग सकामयम्मि विवक्खियपयडीणमणुभागस्स छट्ठाण - हासिभव पsि विप्पडिसेहाभावादो । जयध० ६ कुदो, मिच्छत्तज इण्णाणुभागस कामय सुहुमेह दियहदसमुप्पत्तियसं तकम्मियम्मि सम्मत्त सम्मामिच्छत्ताणमुक्कस्साणुभागस कमस्सेव सभवदसणादो | जयध० ४६
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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