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________________ ३५९ गा०५८] अनुभागसंक्रम-अन्तर-निरूपण १२१. अणुकस्साणुभागसंकामयंतरं केवचिरं कालादो होदि ? १२२. णत्थि अंतरं । १२३. एत्तो जहणणयंतरं । १२४. मिच्छत्तस्स जहण्णाणुभागसंकामयंतरं केवचिरं कालादो होदि १ १२५. जहण्णेण अंतोनुहुत्त । १२६. उक्कस्सेण असंखेजा लोगा। १२७, अजहण्णाणुभागसंकामयंतरं केवचिरं कालादो होदि ? १२८. जहण्णुकस्सेण अंतोमुहुत्तं । १२९. एवमट्टकसायाणं । १३०. णवरि अजहण्णाणुभागसंकामयंतरं केवचिरं कालादो होदि ? १३१. जहण्णेण एयसमओं । १३२. सम्पत्त-सम्मामिच्छत्ताणं जहण्णाणुभागसंकामयंतरं केवचिरं कालादो होदि ? १३३. पत्थि अंतरं । १३४. अजहण्णाणुभागसंकामयंतरं केवचिरं कालादो होदि ? १३५. जहण्णेण एयसमओ। शंका-सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वके अनुत्कृष्ट अनुभागसंक्रमणका अन्तरकाल कितना है ? ॥१२१॥ समाधान-इन दोनो प्रकृतियोके अनुत्कृष्ट अनुभागसंक्रमणका अन्तर नहीं होता है ॥१२२॥ चूर्णिस०-अब इससे आगे अनुभागसंक्रमणका जघन्य अन्तर कहते है ॥२२३॥ शंका-मिथ्यात्वके जघन्य अनुभागसंक्रमणका अन्तरकाल कितना है ? ॥१२४॥ समाधान-मिथ्यात्वके जघन्य अनुभागसंक्रमणका जघन्य अन्तरकाल अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तरकाल असंख्यात लोकप्रमाण है ॥१२५-१२६॥ शंका-मिथ्यात्वके अजघन्य अनुभागसंक्रमणका अन्तरकाल कितना है ॥१२७॥ समाधान-मिथ्यात्वके अजघन्य अनुभागसंक्रमणका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकाल अन्तमुहूर्त है ॥१२८॥ चूर्णिसू०-इसी प्रकार मिथ्यात्वके समान आठों मध्यम कषायोके अजघन्य अनुभागसंक्रमणका अन्तरकाल जानना चाहिए । विशेषता केवल यह है कि आठो मध्यम कषायोंके अजघन्य अनुभागसंक्रमणका अन्तरकाल कितना है ? जघन्य अन्तरकाल एक समय है ॥१२९-१३१॥ शंका-सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिध्यात्वके जघन्य अनुभागसंक्रमणका अन्तरकाल कितना है ? ॥१३२॥ समाधान-इन दोनो प्रकृतियोके जघन्य अनुभागसंक्रमणका अन्तर नहीं होता॥१३३॥ शंका-सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वके अजघन्य अनुभागसंक्रमणका अन्तर १ त कथ १ जहा-सुहुमेइदियहदसमुप्पत्तियजहण्णाणुभागसकमादो अजहण्णभाव गतूण पुणो वि अंतोमूहुत्तेण धादिय सव्वजण्णाणुभागसंकामओ जादो । लद्धमतर होइ । जयध० २ त कथं ? जहण्णाणुभागसकामओ अजहण्णभाव गतूण तप्पाओग्गपरिणामछाणेसु असखेजलोगमेत्त काल गमिय पुणो हदसमुप्पत्तियपाओग्गपरिणामेण जहण्णभावमुवगओ। तस्स लद्धमतर होइ । जयध० ३ सम्वोवसामणाए अतरिदस्स तदुवलभादो । जयध० । ४ कुदो, खवणाए जादजहण्णाणुभागसकामयस्स पुणरुभवाभावादो। जयध० maran
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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