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गा० ५८] अनुभागसंक्रम-अन्तर-निरूपण
३५७ कालादो होदि ? १०१. जहण्णुक्कस्सेण एयसमओ । १०२. अजहण्णाणुभागसंकामओ अणंताणुबंधीणं भंगो । १०३. इत्थि-णqसयवेद-छण्णोकसायाणं जहण्णाणुभागसंकामओ केवचिरं कालादो होदि ? १०४. जहण्णुकस्सेण अंतोमुहुत्तं । १०५. अजहण्णाणुभागसंकामयस्स तिण्णि भंगा। १०६. तत्थ जो सो सादिओ सपज्जवसिदो सो जहण्णेण अंतोमुहुत्तं । १०७. उकस्सेण उबड्डपोग्गलपरियट्ट ।
१०८. एत्तो एयजीवेण अंतरं । १०९. मिच्छत्तस्स उक्कस्साणुभागसंकामयंतरं केवचिरं कालादो होदि ? ११० जहणणेण अंतोमुहुत्तं । १११. उकस्सेण असंखेज्जा
समाधान-उक्त पाँचो कर्मोंका जघन्य और उत्कृष्टकाल एक समयमात्र है ॥१०१॥
चूर्णिसू०-चारो संज्वलन और पुरुषवेदके अजघन्य अनुभागसंक्रमणका काल अनन्तानुबन्धीकपायके समान जानना चाहिए ॥१०२॥
शंका-स्त्रीवेद, नपुंसकवेद और हास्यादि छह नोकषायोंके जघन्य अनुभागसंक्रमणका कितना काल है ? ॥१०३॥
समाधान-उक्त आठो नोकषायोके जघन्य अनुभागसंक्रमणका जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्तप्रमाण है ॥१०४॥
चूर्णिसू०-इन्हीं उक्त आठो नोकषायोके अजघन्य अनुभागसंक्रमणकालके तीन भंग हैं-अनादि-अनन्त, अनादि-सान्त और सादि-सान्त । इनमे जो सादि-सान्त काल है, वह जघन्यकी अपेक्षा अन्तर्मुहूर्तप्रमाण है और उत्कृष्टकी अपेक्षा उपार्धपुद्गल-परिवर्तनप्रमाण है ॥१०५-१०७॥
चूर्णिसू०-अब एक जीवकी अपेक्षा उत्कृष्ट अनुभाग-संक्रामकोका अन्तरकाल कहते हैं ।।१०८॥
शंका-मिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमणका अन्तरकाल कितना है ? ॥१०९॥
समाधान-मिथ्यात्वके उत्कृष्ट अनुभागसंक्रमणका जघन्य अन्तरकाल अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तरकाल असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन है ॥११०-१११॥
१ कुदो, तिण्ह सजलणाण पुरिसवेदस्स च चरिमाणुभागबंधचरिमफालीए लोहसजलणस्स वि समयाहियावलियसकसायम्मि तदुवलद्धीदो । जयध०
२ कुदो खवगचरिमाणुभागखडयम्मि अतोमुहुत्तुक्कीरणद्धापडिबद्धम्मि लद्धजहण्णभावत्तादो । जयध०
३ सम्वोवसामणादो परिवदिय सव्वजहण्णंतोमुहुत्तकालमजहण्ण सकामिय पुणो खवगसेढिं चढिय जहण्णभावेण परिणदम्मि तदुवलद्धीदो। जयध०
४ सव्वोवसामणादो परिवदिय अद्ध पोग्गलपरियट्ट परिभमिय तदवसाणे असकामयत्तमुवगयम्मि तदुवलभादो । जयध
५ तं जहा-उक्कस्सागुभागसकामओ अणुक्कस्सभाव गतूण जहण्णमतोमुहुत्तमतरिय पुणो वि उक्कस्साणुभागस्स पुव्व सकामओ जादो । लद्धमुक्करसाणुभागसकामयजहण्णतरमतोमुहुत्तमेत्त । जयध०
६ त कथ ? सण्णी पंचिदिओ उक्कस्साणुभाग बधिय सकामेमाणो कडयघादेण अणुकस्से णिवदिय एइदिएसु अणतकालमच्छिदूण पुणो सण्णिपचिंदियपजत्तएसुप्यजिय उक्कस्साणुभाग बधिदूण सकामओ जादो। तस्स लद्धमतर होइ । जयध०