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________________ ३५६ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार केवचिरं कालादो होदि ? ८८, जहण्णुक्कस्सेण एयसमओ। ८९. अजहण्णाणुभागसंकामओ केवचिरं कालादो होदि १ ९०. जहणणेण अंतोमुहुत्त । ९१. उक्कस्सेण वे छावहिसागरोवमाणि सादिरेयाणि । ९२. एवं सम्मामिच्छत्तस्स । ९३. णवरि जहण्णाणुभागसंकामओ केवचिरं कालादो होदि १ ९४. जहण्णुकस्सेण अंतोमुहत्तं । ९५. अणंताणुबंधीणं जहण्णाणुभागसंकामओ केवचिरं कालादो होदि १ ९६. जहण्णुक्कस्सेण एयसमओं। ९७. अजहण्णाणुभागसंकामयस्स तिणि भंगा। ९८. तत्थ जो सो सादिओ सपज्जवसिदो सो जहण्णेण अंतोमुहुत्तं । ९९. उक्कस्सेण उवडपोग्गलपरियट्ट । १००. चदुसंजलण-पुरिसवेदाणं जहण्णाणुभागसंकामओ केवचिरं समाधान-सम्यक्त्वप्रकृतिके जघन्य अनुभागसंक्रमणका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समयमात्र है ।।८८॥ शंका-सम्यक्त्वप्रकृतिके अजघन्य अनुभागसंक्रमणका कितना काल है ? ॥८९।। समाधान-सम्यक्त्वप्रकृतिके अजघन्य अनुभागसंक्रमणका जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्टकाल कुछ अविक एक सौ बत्तीस सागरोपम है ॥९०-९१॥ चूर्णिसू०-सम्यक्त्वप्रकृतिके समान ही सम्यग्मिध्यात्वके अजघन्य अनुभागसंक्रमणका काल जानना चाहिए । विशेषता केवल यह है कि सम्यग्मिथ्यात्वके जघन्य अनुभागसंक्रमणका कितना काल है ? जघन्य और उत्कृष्टकाल अन्तमुहूर्त है ॥९२-९४॥ शंका-अनन्तानुवन्धी कषायोके जघन्य अनुभागसंक्रमणका कितना काल है?॥९५॥ समाधान-अनन्तानुबन्धी कपायोके जघन्य अनुभागसंक्रमणका जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समयमात्र है ॥९६॥ चूर्णिसू०-अनन्तानुवन्धी कषायोके जघन्य अनुभागसंक्रमण-कालके तीन भंग है-अनादि-अनन्त, अनादि-सान्त और सादि-सान्त । इनमे जो सादि-सान्त काल है, वह जघन्यकी अपेक्षा अन्तमुहूर्त है और उत्कृष्टकी अपेक्षा उपाधपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण है ॥९७-९९॥ शंका-चारों संज्वलन और पुरुपवेदके जघन्य अनुभाग संक्रमणका कितना काल है ? ॥१०॥ १ कुदो, समयाहियावलियअक्खीणदसणमोहणीय मोत्तूण पुव्वावरकोडीसु तदसभवणियमादो। जयध० २ णिस्सतकम्मियमिच्छाइट्ठिणा सम्मत्त समुप्याइदे लद्धप्प महावस्स सम्मत्तजण्णाणुभागसमस्स सव्वलहु खवणाए जहण्णाणुभागस कमेण विणासिदतभावस्स तेत्तियमेत्तकालावट्टाणदसणादो । जयध° ३ दसणमोहक्खवयचरिमाणुभागखडए तदुवलभादो । जयध० ४ विसजोयणापुरस्सर जपणभावेण सजुत्तपढमसमयाणुभागवधसकमे लद्धजहण्णभावत्तादो । जयध° ५ कुदो; अद्धपोग्गलपरियट्टादिसमए पढमसम्मत्त घेत्तणुवसमसम्मत्तकालभतरे चेय विसजोइय पुणो वि सव्वलहु सजुत्तो होदूण आदि करिय अद्धपोग्गलपरियट्ट परिभमिय तदवसाणे अतोमुहुत्तसेसे समार विसजोयणापरिणदम्मि तदुवलभादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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