SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 452
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ कसाय पाहुडे सुत्त [ ५ संक्रम-अर्थाधिकार ३०६. सेसाणं कम्माणं सव्वत्थोवा अवतव्यसं कामया' । ३०७. असंखेज्जगुणहाणिसंकामया संखेज्जगुणा । ३०८. सेससंकामया मिच्छत्तभंगो । एवं ठिदिसंकमो समत्तो ३४४ 1 चूर्णिसू० - शेप पच्चीस कर्मोंके अवक्तव्य संक्रामक सबसे कम हैं । इनसे असंख्यात - गुणहानिसंक्रामक संख्यातगुणित है । इनसे शेव संक्रामकोका अल्पबहुत्व मिथ्यात्व - संक्रामक अल्पत्वके समान है ।। ३०६-३०८।। इस प्रकार स्थितिसंक्रमण अधिकार समाप्त हुआ । समयस चित्तन्भुवगमादो । एदे वुण तेसिमसखे अभागा, वेसागरोवमकालभतरे वेदयसम्माइट्रिट्ठरा सिसचयसदीहुकाल भंतर मिच्छाइटिसचयसहिदस्त पहाणत्तावलवणादो । तदो असखेज्जगुणा जादा | जयध० १ अनंताशुत्रीणं ताव पलिदोवमस्त संखेज्जभागमेत्ता उकस्सेणेयसमयम्मि अवत्तव्वसकमं कुणति । वारसकसाय - णवणोकसायाणं पुण सखेज्जा चेव उवसामया सव्वोवसामणादो परिवडिय अवत्तव्वसंकम कुणमाणा लम्मति त्ति सव्वत्थोत्तमेदेसिं जाद | जयध० २ अणताणुत्रधिविसंजोयणाए चरित्तमोहक्खवणाए च दूराव किट्टिप्पहुडि सखेज्जसहस्स ट्रिदिखदयचरमफाली व माणजीवाण मेयवि यप्प पडिवद्धावत्तव्त्रसंकामरहितो तहाभावसिद्धीए पाइयत्तादो । जयघ०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy