SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 447
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ३३९ गा० ५८ ] स्थितिसंक्रम-पदनिक्षेप-स्वामित्व-निरूपण २५४. हाणी मिच्छत्तभंगो। २५५. उकस्सयमवट्ठाणं कस्स ? २५६. पुव्वुप्पण्णादो सम्मत्तादो समयुत्तरमिच्छत्तहिदिसंतकम्मिओ सम्मत्तं पडिवण्णो तस्स विदियसमयसम्माइडिस्स उक्कस्सयमवट्ठाणं । २५७ एत्तो जहण्णियाए* । २५८. सम्मत्त-सम्मामिच्छत्तवज्जाणं जहणिया वड्डी कस्स १ २५९. अप्पप्पणो समयूणादो उक्कस्स हिदिसंकमादो उकस्सहिदि संकमेमाणयस्स तस्स जहणिया वड्डी'। २६०. जहणिया हाणी कस्स ? २६१ तप्पाओग्गसमयुत्तरजहण्णहि दिसंकमादो तप्पाओग्गजहण्णहिदि संकममाणयस्स तस्स जहणिया हाणी । चूर्णिसू०-उक्त दोनो प्रकृतियोके स्थितिसंक्रमण-विपयक हानिकी प्ररूपणा मिथ्यात्वके समान जानना चाहिए ॥२५४॥ शंका-सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वका स्थितिसंक्रमण-विषयक उत्कृष्ट अवस्थान किसके होता है ? ॥२५५॥ समाधान-जो जीव पूर्वोक्त प्रकारसे सम्यक्त्वको उत्पन्न कर ( और मिथ्यात्वमे जाकर ) सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वके स्थितिसत्त्वसे (एक समय अधिक मिथ्यात्वकी स्थितिको बाँधकर ) समयोत्तर मिथ्यात्वस्थितिसत्कर्मिक होकर सम्यक्त्वको प्राप्त हुआ, उस द्वितीय समयवर्ती सम्यग्दृष्टिके उक्त दोनों कर्मोंका उत्कृष्ट अवस्थान होता है ॥२५६॥ चूर्णिसू०-अव इससे आगे सर्व कर्मोंके जघन्य वृद्धि, हानि और अवस्थानके स्वामित्वकी प्ररूपणा की जाती है ॥२५७।। शंका-सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वको छोड़कर शेप सब कर्मोंकी जघन्य वृद्धि किसके होती है ? ॥२५८॥ समाधान-अपने अपने एक समय कम उत्कृष्ट स्थितिसंक्रमणसे उत्कृष्ट स्थितिका संक्रमण करनेवाले जीवके उस उस कर्मकी जघन्य वृद्धि होती है ।।२५९।। शंका-पूर्वोक्त कर्मोकी जघन्य हानि किसके होती है ? ॥२६॥ समाधान-तत्तत्प्रायोग्य एक समय अधिक जघन्यस्थितिसंक्रमणसे तत्तत्प्रायोग्य जघन्य स्थितिको संक्रमण करनेवाले जीवके उस-उस कर्मकी जघन्य हानि होती है ।।२६१॥ * ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'जहणिया' इतना ही पाठ मुद्रित है । ( देखो पृ० १०९७) १ तत्थ पढमसमयसकतमिच्छत्तटिठदिसतकम्मस्स विदियसमए गलिदावसिठस्स पढमसमयसम्मत्तसम्मामिच्छत्तठिदिसकमपमाणेणावठाणदसणादो । जयध० । २ त कथ १ समयूणुक्कसहिदि बधियूण तदणतरसमए उकस्सछिदि बधिय बंधावलियवदिक्कत सकामेतो हेट्ठिमसमयूणछिदिसकमादो समयुत्तरं सकामेदि । तदो तस्स जहणिया वड्ढी होदि; एयट्ठिादमत्तस्सव तत्थ वुड्ढिदसणादो । उदाहरणपदसणट्ठमेदं परूविद, तदो सव्वासु चेव ट्ठिदीसु समयुत्तरवधवसेण जहणिया वड्ढी अविरुद्धा परूवेयव्वा । जयधः । ..३ समयुत्तरधुवट्ठिदि संकामेदुमाढतो, तस्स जहणिया हाणी, एयठिदिमेत्तस्सेव तत्थ हाणिदसणादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy