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________________ ३२६ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार वेदस्स जहण्णहिदिसंकमो संखेज्जगुणो' । १२६. जढिदिसंकमो विसेसाहिओ । १२७. छण्णोकसायाणं जहण्णढिदिसंकमो संखेज्जगुणो । १२८. इत्थि-णqसयवेदाणं जहण्णहिदिसंकमो तुलो असंखेज्जगुणों । १२९. अट्टहं कसायाणं जहण्णहिदिसंकमो असंखेज्जगुणों । १३०. सम्मामिच्छत्तस्स जहण्णहिदिसंकमो असंखेज्जगुणों । १३१.मिच्छत्तस्स जहण्णाडिदिसंकमो असंखेज्जगुणों । १३२. अणंताणुवंधीणं जहण्णहिदिसंकमो असंखेज्जगुणों। १३३.णिरयगईए सव्वत्थोवो सम्पत्तस्स जहण्णढिदिसंकमो । १३४ जद्विदिसंकमो असंखेज्जगुणो। १३५. अणंताणुवंधीणं जहण्णढिदिसंकमो असंखेज्जगुणों । यस्थितिक संक्रमणसे हास्यादि छह नोकपायोका जघन्य स्थितिसंक्रमण संख्यातगुणित है । छह नोकपायोके जघन्य स्थितिसंक्रमणसे स्त्रीवेद और नपुंसकवेदका जघन्य स्थितिसंक्रमण परस्पर तुल्य हो करके भी असंख्यातगुणित है। इससे आठ मध्यम कषायोका जघन्य स्थितिसंक्रमण असंख्यातगुणित है। आठो कषायोके जघन्य स्थितिसंक्रमणसे सम्यग्मिथ्यात्वका जघन्य स्थितिसंक्रमण असंख्यातगुणित है। सम्यग्मिथ्यात्वके जघन्य स्थितिसंक्रमणसे मिथ्यात्वकाजघन्य स्थितिसंक्रमण असंख्यातगुणित है । मिथ्यात्वके जघन्य स्थितिसंक्रमणसे अनन्तानुवन्धी कपायोका जघन्य स्थितिसंक्रमण असंख्यातगुणित है । ।।११६-१३२।। विशेषार्थ-जिस किसी विवक्षित कर्मकी संक्रमणकालमे जो स्थिति होती है, यह यत्स्थिति कहलाती है और उसके संक्रमणको यत्स्थितिकसंक्रमण कहते हैं। ___ चूर्णिसू०-नरकगतिमे सम्यक्त्वप्रकृतिका जघन्य स्थितिसंक्रमण सबसे कम है। इससे इसीका यस्थितिकसंक्रमण असंख्यातगुणित है। सम्यक्त्वप्रकृतिके यत्स्थितिकसंक्रमण १ किंचूणवेमासेहिंतो अंतोमुहुत्तूणट्ठवरसाण तहाभावस्स णायोववण्णत्तादो | जयध० २ समयूणदोआवलियपरिहीणट्ठवस्सेहिंतो छण्णोकसायचरिमछिदिखडयस्स सखेज्जवस्ससहस्सपमाणस्स सखेज्जगुणत्ताविरोहादो। जयध० ३ पलिदोवमासखेजदिभागपमाणत्ता दो । जयध० ४ इत्थि-गवुसयवेदाणं चरिमट्ठिदिखडयायामादो दुचरिमद्विदिखडयायामो असखेजगुणो । एव दुचरिमादो तिचरिमठिदिखडयमसखेज्जगुण । तिचरिमादो चदुचरिममिदि एदेण कमेण सखेजट्ठिदिखडयसहस्साणि हेटछा ओसरिय अतरकरणप्पारभादो पुत्वमेव अट्ठकसाया खविदा । तेण कोरणेणेदेसि चरिमठ्ठिदिखडयचरिमफाली तत्तो असखेनगुणा जादा । जयध० ५ चरित्तमोहखवयपरिणामेहि घादिदावसेसो अट्ठकसायाण जहण्णछिदिसकमो। एसो वुण तत्तो अणतगुणहीणविसोहिदसणमोहक्खवणपरिणामेहि घादिदावसेसो त्ति । तत्तो एदस्सासखेबगुणत्तमव्वामोहेण पडिवजेदव्यं । जयध० ६ मिच्छत्तक्खवणादो अतोमुहुत्तमुवरि गंतूण सम्मामिच्छत्तस्स जहण्णछिदिसकमुप्पत्तिदसणादो। ७ विसजोयणापरिणामेहिंतो दसणमोहक्खव यपरिणामाणमण तगुणत्तेण मिच्छत्तचरिमफालीटी अणताणुवधिचरिमफालीए असखेजगुणत्तविरोहाभावादो । जयघ० ८ कदकरणिनोववाद पडुच्च एयहिदिमेत्तो लभइ ति सव्वत्थोवत्तमेदस्स भणिद । जयध० ९ कुदो ! पल्दिोवमासंखेज्जदिभागपमाणत्तादो | जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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