SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 433
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गा० ५८] स्थितिसंक्रम-अल्पबहुत्व-निरूपण ३२५ ११२. सोलसकसायाणमुक्कस्सडिदिसंकमो विसेसाहिओ । ११३. सम्मत्त-सम्मामिच्छताणमुक्कस्सद्विदिसंकमो तुल्लो विसेसाहिओ। ११४. मिच्छत्तस्स उक्कस्सहिदिसंकमो विसेसाहिओ। ११५. एवं सव्वासु गईसु।। ११६. एत्तो जहण्णयं । ११७. सव्वत्थोवो सम्मत्त-लोहसंजलणाणं जहण्णद्विदिसंकमों । ११८. जढिदिसंकमो असंखेज्जगुणों । ११९. मायाए जहण्णहिदिसंकमो संखेज्जगुणों । १२०.जहिदिसंकमो विसेसाहिओं । १२१.माणसंजलणस्स जहण्णट्ठिदिसंकमो विसेसाहिओं। १२२. जहिदिसंकमो विसेसाहिओ । १२३. कोहसंजलणस्स जहण्णहिदिसंकमो विसेसाहिओ" । १२४.जट्ठिदिसंकमो विसेसाहिओ" । १२५.पुरिसस्थितिसंक्रमण विशेष अधिक है । सोलह कषायोके उत्कृष्ट स्थितिसंक्रमणसे सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वका उत्कृष्ट स्थितिसंक्रमण परस्पर तुल्य हो करके भी विशेष अधिक है। सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वके उत्कृष्ट स्थितिसंक्रमणसे मिथ्यात्वका उत्कृष्ट स्थितिसंक्रमण विशेष अधिक है। इसी प्रकारसे सभी गतियोमे उत्कृष्ट स्थितिसंक्रमण-सम्बन्धी अल्पबहुत्व जानना चाहिए ।।११०-११५।। चूर्णिसू०-अव इससे आगे जघन्य स्थितिसंक्रमण-सम्बन्धी अल्पबहुत्वको कहते हैं । सम्यक्त्वप्रकृति और संज्वलनलोभका जघन्य स्थितिसंक्रमण सबसे कम है। इससे इन्ही प्रकृतियोका यस्थितिकसंक्रमण असंख्यातगुणित है। इससे संज्वलनमायाका जघन्य स्थितिसंक्रमण संख्यातगुणित है। इससे संज्वलनमानका जघन्य यत्स्थितिकसंक्रमण संख्यातगुणित है। इससे इसीका यत्स्थितिकसंक्रमण विशेप अधिक है। इससे संज्वलनमानका जघन्य स्थितिसंक्रमण विशेप अधिक है। इससे इसीका यस्थितिकसंक्रमण विशेष अधिक है। संज्वलनमानके यस्थितिकसंक्रमणसे संज्वलनक्रोधका जघन्य स्थितिसंक्रमण विशेष अधिक है। इससे इसीका यस्थितिकसंक्रमण विशेष अधिक है। संज्वलनक्रोधके यत्स्थितिकसंक्रमणसे पुरुपवेदका जघन्य स्थितिसंक्रमण संख्यातगुणित है । इससे इसीका यत्स्थितिकसंक्रमण विशेप अधिक है । पुरुपवेदके ६ दोआवलिऊणचालीससागरोवमकोडाकोडीपमाणत्तादो | जयध० २ एदेसिमुक्कसठिदिसकमो अतोमुहुत्त णसत्तरिसागरोपमकोडाकोडिमेत्तो। एसो वुण कसायाणमुक्कस्सट्ठिदिसकमादो विसेसाहिओ । केत्तियमेत्तेण ? अतोमुहुत्तूणतीससागरोवमकोडाकोडिमेत्तेण । जयध० ३ बधोदयावलिऊणसत्तरिकोडाकोडिसागरोवमपमाणत्तादो। एत्थ विसेसपमाणमतोमुहुत्त । जयध ४ एयठिदिपमाणत्तादो। ५ जा जम्मि सकमणकाले ट्ठिदी सा जट्टिती, जा जस्स अस्थि सो सकमो जट्ठितिसंकमो । कम्मप० ६ समयाहियावलियपमाणत्तादो । जयध० ७ आबाहापरिहीणद्धमासपमाणत्तादो । जयध० ८ समयूणदोआवलियपरिहीणाबाहामेत्तेण । जयध० ९ समयूणदोआवलियूणद्धमासादो अतोमुहुत्तूणमासस्सेदस्स तदविरोहादो । जयध० १० समयूणदोआवलियपरिहीणाबाहापवेसादो । जयध० ११ आबाहूणवेमासपमाणत्तादो । जयध० १२ एत्थ विसेसपमाण समयूणदोआवलियपरिहीणाबाहामेत्त । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy